-सखियां, सावन बहुत सुहावन… प्रकृति, प्रेम, विरह और शिवभक्ति का अनूठा संगम है सावन
दीपक कुमार तिवारी। भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर की पंक्ति—“सखियां, सावन बहुत सुहावन”—केवल सावन के सौंदर्य का वर्णन नहीं करती, बल्कि भारतीय लोकमानस में वर्षा की उस चिरंतन अनुभूति को स्वर देती है, जिसमें प्रकृति, प्रेम, अध्यात्म, विरह, उल्लास और लोकजीवन एकाकार हो जाते हैं। सावन केवल वर्षा का मास नहीं, बल्कि प्रकृति के फिर से श्रृंगारित होने, धरती के तृप्त होने और मनुष्य के अंतर्मन में नवोन्मेष का समय है। आकाश में उमड़ते-घुमड़ते मेघ, धरती पर गिरती रिमझिम फुहारें, पेड़ों पर लौटती हरियाली और मंदिरों में गूंजता ‘ॐ नमः शिवाय’ सावन के समवेत राग को और गहरा कर देते हैं।
सावन की प्रत्येक बूंद अपने भीतर एक कहानी समेटे होती है। कोई बूंद विरहिणी की आंखों से छलकी होती है, कोई मिलन की खुशी में बरसती है और कोई तपती धरती के अधरों पर अमृत बनकर उतरती है। शायद इसी कारण सावन को आंसुओं की तासीर परखने वाली ऋतु भी कहा जा सकता है। दुख में बहने वाले आंसू हों या आनंद में छलक उठी आंखें, दोनों की स्मृतियां सावन के मेघों से कहीं न कहीं जुड़ जाती हैं।
सावन मिलन का प्रतीक है तो विरह का भी। यह श्रृंगार का उत्सव है तो साधना का भी। मनुष्य अपने भाव और अनुभूति के अनुसार सावन को महसूस करता है। सावन मानो मन की वह भागवत है, जिसे अंतर्मन अपने भीतर पढ़ता है और वह गीतगोविंद है, जिसकी प्रत्येक अष्टपदी पर देह का रोम-रोम पुलकित हो उठता है। वर्षा की झड़ी में गिरती बूंदें केवल धरती को नहीं भिगोतीं, वे मानो आकाश से उतरती नर्तकियां हैं, जिनकी हर थिरकन में प्रकृति का उल्लास छिपा है।
भारतीय साहित्य में वर्षा का वर्णन जितना प्राचीन है, उतना ही विराट भी। वैदिक ऋषियों ने वर्षा के देवता पर्जन्य की स्तुति की। उनके लिए वर्षा केवल प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति थी। संस्कृत साहित्य में वर्षा कभी उन्मत्त दिखाई देती है, कभी करुण, कभी रति का उद्दीपन बनती है तो कभी विरही हृदय का आश्रय।
कालिदास के ‘मेघदूत’ में मेघ स्वयं विरही यक्ष की आशा का संवाहक बन जाता है। यक्ष मेघ का अभिनंदन करता है और उसे अपने संदेश का वाहक बनाकर प्रिय तक पहुंचने की उम्मीद करता है। यहां मेघ केवल जल का समूह नहीं, बल्कि प्रेम और प्रतीक्षा का दूत है। ‘ऋतुसंहार’ में कालिदास ने वर्षा के आगमन को ऐसे चित्रित किया है, मानो पावस जल-बिंदुओं से परिपूर्ण मेघ रूपी मतवाले हाथी पर आरूढ़ होकर आया हो। विद्युत उसकी पताका और मेघगर्जन उसका मृदंग बन जाता है। प्रकृति किसी राजकीय विजय-यात्रा के स्वागत में सजी हुई प्रतीत होती है।
भर्तृहरि से जयदेव और शूद्रक तक अनेक संस्कृत कवियों ने वर्षा को अपनी-अपनी काव्यदृष्टि से देखा। ‘मृच्छकटिकम्’ में गरजते मेघ, आंधी और कौंधती बिजली वर्षा के उग्र रूप को सामने लाते हैं। वहीं बाद के हिंदी साहित्य में निराला, नागार्जुन और अज्ञेय जैसे कवियों ने सावन और बादलों को अलग-अलग संवेदनाओं से जोड़ा।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के यहां बादल तपती धरती को शीतलता देने और नवजीवन का संदेश लेकर आते हैं। नागार्जुन की दृष्टि में घिरते बादल हिमालय की धवल चोटियों और मानसरोवर के स्वर्णिम कमलों पर गिरती शीतल बूंदों का दृश्य रचते हैं। अज्ञेय की सावन-रात्रि में कोयल और पपीहे की पुकार प्रेम की अंतर्ध्वनि बन जाती है। “रात सावन की, मनभावन की, पिय आवन की” जैसी पंक्तियां सावन को प्रतीक्षा, प्रेम और मिलन की अनंत आकांक्षा में बदल देती हैं।
शास्त्रीय साहित्य से निकलकर जब सावन लोकजीवन में उतरता है तो उसका रूप और भी आत्मीय हो जाता है। नववधू के हाथों की मेहंदी, हरी चूड़ियों की खनक, पीहर जाने की इच्छा, झूले की पेंग और प्रियतम की प्रतीक्षा लोकगीतों में जीवंत हो उठती है। सावन में हरे वस्त्र पहनने और हरी चूड़ियां धारण करने की परंपरा प्रकृति की हरितिमा से जुड़ी मानी जाती है। वर्षा के साथ जब धरती हरे वस्त्र धारण करती है, तब स्त्री भी अपने श्रृंगार के माध्यम से प्रकृति के इस नवश्रृंगार में सहभागी बनती है।

कजरी, मल्हार, सावन, बारहमासा और अन्य लोकधुनों में वर्षा का जो रस मिलता है, वह भारतीय लोकसंस्कृति की अमूल्य निधि है। लोकगीतों में नववधू कभी प्रिय से मेहंदी लाने का आग्रह करती है तो कभी सखियों के साथ झूले पर बैठकर सावन का उत्सव मनाती है। इन गीतों में प्रेम, प्रतीक्षा, विरह और उल्लास की अनेक छवियां दिखाई देती हैं।
सावन का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पक्ष भगवान शिव से जुड़ा है। इस मास में शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। कहीं कांवरिए गंगाजल लेकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, कहीं रुद्राभिषेक होता है और कहीं ‘हर-हर महादेव’ का घोष वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।
शिव और सावन का संबंध मानो प्रकृति और पुरुष के सनातन संवाद का प्रतीक है। वर्षा धरती को तृप्त करती है और शिवभक्ति मन को। एक ओर मेघ बरसते हैं तो दूसरी ओर श्रद्धा। एक ओर खेतों में हरियाली आती है तो दूसरी ओर मन में आस्था का अंकुर फूटता है।
भारतीय चित्रकला परंपरा में भी वर्षा और प्रेम का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। गीतगोविंद से प्रेरित चित्रों और रागमाला परंपरा में वर्षा, विरह और श्रृंगार से जुड़ी नायिकाओं की भाव-भंगिमाओं को रंग और रेखाओं के माध्यम से अमर किया गया है। सावन यहां केवल ऋतु नहीं, बल्कि मनोभावों का दृश्य रूप बन जाता है।
सावन इसलिए इतना सुहावन है क्योंकि इसमें धरती का सौंदर्य, आकाश की उदारता, प्रेम की व्याकुलता, विरह की पीड़ा, मिलन की पुलक, लोकगीतों की मधुरता और शिवभक्ति की आध्यात्मिकता एक साथ मौजूद रहती है। जब मेघ घिरते हैं, मयूर नृत्य करते हैं, आम के पेड़ों पर झूले पड़ते हैं, चूड़ियां खनकती हैं और मंदिरों में ‘हर-हर महादेव’ का घोष गूंजता है, तब लगता है कि सावन केवल आकाश से नहीं उतरता, बल्कि मन के भीतर भी बरसता है।
सावन में केवल वर्षा नहीं होती। स्मृतियां बरसती हैं, संवेदनाएं बरसती हैं, प्रेम बरसता है, भक्ति बरसती है और कभी-कभी आंखों से वह सब भी बरस पड़ता है, जिसे शब्द जीवन भर नहीं कह पाते। शायद इसी गहरी अनुभूति के कारण भिखारी ठाकुर की लोकवाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है—“सखियां, सावन बहुत सुहावन…”












