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केरल में इतिहास बनाम सियासत: ‘मुलक्करम’ और चन्नार विद्रोह पर छिड़ी नैरेटिव की जंग

-केरल में इतिहास बनाम सियासत: ‘मुलक्करम’ और चन्नार विद्रोह पर छिड़ी नैरेटिव की जंग

तिरुवनंतपुरम | विशेष रिपोर्ट

केरल की राजनीति इन दिनों विकास और शासन से आगे बढ़कर इतिहास की व्याख्या पर केंद्रित हो गई है। त्रावणकोर काल में कथित जातिगत भेदभाव, ‘मुलक्करम’ (ब्रेस्ट टैक्स) और ‘नंगेली’ की कहानी को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। यह मुद्दा अब इतिहास बनाम राजनीति की बड़ी लड़ाई का रूप ले चुका है।
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने हाल ही में एक कार्यक्रम में आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी धर्म के नाम पर समाज को बांटकर चुनावी लाभ लेने की कोशिश कर रही है। उन्होंने चन्नार विद्रोह का हवाला देते हुए कहा कि यह इतिहास उस सामाजिक ढांचे की सच्चाई को उजागर करता है, जिसे आज कुछ ताकतें महिमामंडित करती हैं।
वहीं भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वामपंथी दल इतिहास के चुनिंदा हिस्सों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, ताकि जाति और वर्ग के आधार पर अपना वोट बैंक मजबूत किया जा सके। पार्टी का कहना है कि यह “सिलेक्टिव हिस्ट्री” है, जिसका इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है।
विवाद तब और गहरा गया जब 2019 में NCERT की 9वीं कक्षा की किताब से त्रावणकोर के जातिगत संघर्ष से जुड़े अध्याय हटाए गए। इसे लेकर विजयन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा और शिक्षा के “भगवाकरण” का आरोप लगाया, जबकि राज्य सरकार ने इन विषयों को सप्लिमेंट्री पुस्तकों के जरिए पढ़ाना जारी रखा।


दरअसल, केरल की सियासत में नायर, एझावा, मुस्लिम और ईसाई समुदाय अहम भूमिका निभाते हैं। 2016 तक नायर और एझावा समुदाय वामपंथ के मजबूत आधार माने जाते थे, लेकिन 2019 के बाद राजनीतिक समीकरण बदलने लगे। भाजपा ने हिंदू वोटरों को साधने की रणनीति अपनाई, जिससे ऊंची जातियों और ओबीसी वर्ग में उसकी पकड़ बढ़ी।
इस पूरे विवाद का केंद्र ‘मुलक्करम’ और ‘नंगेली’ की कहानी है। कहा जाता है कि 19वीं सदी में निचली जाति की महिलाओं को शरीर ढंकने पर टैक्स देना पड़ता था। ‘नंगेली’ की कथा, जिसमें उन्होंने विरोध स्वरूप अपने स्तन काटकर कराधान का विरोध किया, आज भी सियासत में भावनात्मक मुद्दा बनी हुई है। हालांकि कई इतिहासकार इसकी सत्यता पर सवाल उठाते हैं और इसे मिथक या अतिरंजित कथा मानते हैं।
इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी तर्क देता है कि उस दौर में पहनावे और सामाजिक परंपराएं अलग थीं, और इसे केवल जातिगत भेदभाव के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण हो सकता है। इसके बावजूद चन्नार विद्रोह को सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई के रूप में देखा जाता है, जिसने अंततः महिलाओं को ऊपरी वस्त्र पहनने का अधिकार दिलाया।
अब यही इतिहास केरल की राजनीति में “नैरेटिव बनाम काउंटर नैरेटिव” की जंग बन चुका है। वामपंथ इसे सामाजिक न्याय की लड़ाई बताकर जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, जबकि भाजपा इसे चुनावी एजेंडा करार देकर खारिज कर रही है।
आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता इस ऐतिहासिक बहस को किस नजरिए से देखती है—एक सच्चाई के रूप में या फिर सियासी रणनीति के हिस्से के तौर पर।