*हमार भारतीय नववर्ष
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*स्वामी विवेकानन्द जी कहले रहलीं की अगर हमके गौरव से जीयलें क भाव जगवावे क बा, त हमके अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ती क बीज के पल्लवित करे क होई तबे राष्ट्रीय तिथि क आश्रय लेवे क होई।
ग़ुलाम बनाए रखे वाले परकीयन क दिनांक पर आश्रित रहे वाला व्यवहार बदले क होई। भारतीय तिथि हमरे मन में इ उद्घोष जगावे ला की हम धरती माई क पुत्र हई सूर्य चंद्र अउर नवग्रह हमार आधार ह। प्राणी मात्र हमरे परिवारिक सदस्य हउए तब तबे हमरे संस्कृति क बोध’ वसुधैव कुटुंबकम्’ क सार्थक्य सिद्ध होई।
ध्यान रहे की सामाजिक विकृति ही भारतीय जीवन में दोस अउर रोग भर दिहले बा, फलतः कमज़ोर राष्ट्र के भू-भाग पर परकीय, परधर्मिकीय आक्रमण कर हम सभ के ग़ुलाम बना दीहले बा।
एही से सदियन से पराधीनता क पीड़ा झेले क पड़ल रहल। पराधीनता के कारन जवने मानसिकता क विकास भइल ओसे हमरे राष्ट्रीय भाव क क्षय हो गइल अउर समाज में व्यक्तिवाद, भय अउर निराशा क संचार होखे लागल।
जवने समाज में भगवान् श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक अउर अनेकनेक ऋषि – मुनि लोगन क आविर्भाव भइल। जवने धरा-धाम पर परशुराम, बाल्मीकि, वशिष्ठ, भीष्म अउर चाणक्य जइसन दिव्य पुरुषयन क जन्म भइल। जहवां परम् प्रतापी महाराज अउर सम्राटन क श्रृंखला क गौरवशाली इतिहास निर्मित भइल। वहवां क गौरवशाली परंपरा ही हमार वास्तविक हित कर सकी।
भारतीय सांस्कृतिक जीवन क विक्रमी संवत् से गहरा नाता ह। भारतीय नववर्ष चइत मास के शुक्ल पक्ष क प्रतिपदा के ही मनावल जाला। जेके विक्रमी संवत् क नवीन दिवस भी कहल जाला।

हमार संस्कृति, ही हमार गौरव ह:
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*अइसने पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई के जब केहू एक जनवरी के नववर्ष क बधाई दीहलस त उ उत्तर दीहले रहलें – की कवने बात क बधाई बा? हमरे देश अउर देश के सम्मान क त ए नववर्ष से कवन सम्बन्ध नाहीं बा, अउरी न कबो रही*
इहे बात हम लोगन के भी समझावे क अउर समझे क होई। की का एक जनवरी के साथे अइसन एक भी कवनों प्रसङ्ग जुड़ल बा, जवने से राष्ट्र प्रेम जाग सकेला?
न त ऋतु बदलल.. न मौसम
न त कक्षा बदलल… न सत्र
न त फसल बदलल…न खेती
न त पेड़ पउधन क रंगत न सूरज चाँदा सितारन क दिशा न ही नक्षत्र।।
ईस्वी संवत क नया वर्ष ०१ जनवरी के अउर भारतीय नववर्ष (विक्रमी संवत) चइत शुक्ल प्रतिपदा के मनावल जाला। आई देखी की दुनों क तुलनात्मक अंतर का होला –
०१. प्रकृति- ०१ जनवरी के कवनों अंतर नाही ह जइसन दिसम्बर वइसने जनवरी.. चइत मास में चारो तरफ फूल खिल जाला, पेड़न पर नया पत्ता आ जाला। चारो तरफ हरियाली यानी की जिसे लाला की प्रकृति भी नया साल मनावत होखेI
०२. वस्त्र- दिसम्बर अउर जनवरी में उहे वस्त्र, कंबल, रजाई, ठिठुरत हाथ अउर पैर.. चइत मास में सर्दी जा रहत होला, गर्मी क आगमन होखे जा रहेला।
०३. विद्यालय क नया सत्र- दिसंबर जनवरी में उहे कक्षा उसे सत्र कुछ नया नाहीं.. जबकि मार्च अप्रैल में स्कूलयन क रिजल्ट आवेला नया कक्षा नया सत्र यानि की विद्यालयन में भी नया वर्ष।
०४. नया वित्तीय वर्ष- वर्ष दिसम्बर-जनबरी में कवनों खाता क बन्दी भी नाही होला.. जबकि ३१ मार्च के बैंक क आडिट होला, कलोसिंग होला, नया वही खाता खोलल जाला। सरकारी कार्यालय में भी काम काज क नया सत्र शुरू होला।
०५. कलैण्डर- जनवरी में नया कलैण्डर आवेला.. चइत में नाया पंचांग आवेलाI ओही से सभ भारतीय पर्व, विवाह अउर अन्य महूर्त देखल जाला। एकरे बिना हिन्दू समाज के जीबन क कल्पना भी नाही कइल सकल जात ह एतना महत्वपूर्ण ह, इ चइत क कैलेंडर यानि पंचांगI
०६. किसान क खातिर नवका वर्ष – दिसंबर जनवरी में खेतन में उहे फसल होला.. जबकि मार्च-अप्रैल में फसल कटेला नया अनाज घर में आवेला, त किसान क भी नया वर्ष अउर नया उत्साह भी चइत में ही होला।
०७. पर्व मनवले की विधि- ३१ दिसम्बर क रात नया साल के स्वागत के खातिर लोग जमकर मदिरा पान करेलें, हंगामा करेलें, रात के पीके गाड़ी चलवले से दुर्घटना क भी सम्भावना, छेड-छाड जइसन वारदात, पुलिस प्रशासन बेहाल अउर भारतीय सांस्कृतिक मूल्य क विनाश होला.. जबकि “भारतीय नववर्ष व्रत से शुरू होला, पहला नवरात्र होला” घर घर मे माता रानी क पूजा होला। शुद्ध सात्विक वातावरण बनेला।
०८. ऐतिहासिक महत्त्व-
एक जनवरी क कवनों भी ऐतेहासिक महत्व नाही होला.. जबकि चइत प्रतिपदा के दिन महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् क शुरुआत, भगवान झूलेलाल क जन्म, नवरात्र प्रारंभ, ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि क रचना इत्यादि क सम्बन्ध एह दिन से होला।
अंग्रेजी कलेंडर क तारीख अउर अंग्रेज मानसिकता के लोग के अतिरिक्त कुछ नाही बदलेला..आपन नव संवत् ही नया साल होला।
जब ब्रह्माण्ड से लेके सूर्य चाँद क दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पउधा क नया पत्ती, किसान क नया फसल, विद्यार्थी क नया कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन होत ह। जवन विज्ञान पर आधारित ह। अपने मानसिकता के बदलीं। विज्ञान आधारित भारतीय काल गणना के पहचानी।
हम सब ०१ जनवरी के “केवल कैलेंडर बदलीं.. आपन संस्कृति नाहीं।”
आई जागीं अउर जगाई, भारतीय संस्कृति के अपनाई अउर आगे बढ़त रहीं।
-पनपा “गोरखपुरी”













