-बदलते परिवेश में बेरंग होती होली: घटता उल्लास, बढ़ती सामाजिक दूरियां और बदलती परंपराओं का सच
आलेख:दीपक कुमार तिवारी।
रंग, उमंग, अपनापन और भाईचारे का प्रतीक होली का त्योहार सदियों से भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान रहा है। कभी यह पर्व गलियों में गूंजते फाग गीतों, ढोल-मंजीरों की थाप, चौपालों की हंसी, घर-घर की रौनक और दिलों के मिलन का उत्सव हुआ करता था। लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश, भागदौड़ भरी जिंदगी, तकनीकी निर्भरता और आपसी दूरियों ने इस त्योहार की आत्मा को कहीं न कहीं प्रभावित किया है। आज होली के रंग तो दिखाई देते हैं, पर रिश्तों की गर्माहट और सामूहिकता का रंग फीका पड़ता नजर आ रहा है।
विशेषकर भारत जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देश में, जहां त्योहार सामाजिक एकता का माध्यम रहे हैं, वहां होली का बदलता स्वरूप चिंता का विषय बनता जा रहा है।
परंपराओं की वह पुरानी होली:
एक समय था जब होली केवल एक दिन का आयोजन नहीं बल्कि कई दिनों तक चलने वाला उत्सव हुआ करता था। गांवों में फाग, चैता और लोकगीतों की महफिलें सजती थीं। बच्चे टेसू के फूलों से रंग बनाते थे, महिलाएं घरों में गुजिया-पापड़ी तैयार करती थीं और मोहल्लों में सामूहिक होलिका दहन के जरिए लोग एक-दूसरे से गले मिलते थे।
उस दौर में होली का असली अर्थ था—
मन का मैल धोना, रिश्तों की मरम्मत करना और समाज को जोड़ना।
लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे के घर जाते थे। रंग लगाने के साथ रिश्तों में भी रंग घुलता था। त्योहार सामूहिकता का प्रतीक था, न कि औपचारिकता का।
बदलते समय की होली: उत्सव से औपचारिकता तक
आज का दौर तेजी से बदल रहा है। शहरीकरण, नौकरी की व्यस्तता, परिवारों का एकल होना और समय की कमी ने त्योहारों की सामूहिकता को सीमित कर दिया है।
अब होली कई जगहों पर:
केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सिमट रही है
‘हैप्पी होली’ संदेशों में सीमित हो गई है
पड़ोसी से मिलना-जुलना कम हो गया है
लोग घरों में बंद रहना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं
जहां पहले लोग टोली बनाकर निकलते थे, अब लोग भीड़ और हुड़दंग से बचने की कोशिश करते हैं। त्योहार का उत्साह कहीं न कहीं डर, संकोच और औपचारिकता में बदल गया है।
बढ़ती सामाजिक दूरियां: कारण और प्रभाव
पारिवारिक ढांचे में बदलाव-
संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है। पहले दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहनों के साथ जो सामूहिक उत्सव होता था, अब वह सिमटकर सीमित दायरे में रह गया है।
तकनीकी निर्भरता-
मोबाइल और इंटरनेट ने लोगों को आभासी दुनिया में तो जोड़ दिया, लेकिन वास्तविक मेलजोल कम कर दिया। लोग आमने-सामने मिलने की बजाय ऑनलाइन शुभकामनाएं भेजकर कर्तव्य पूरा समझ लेते हैं।
सुरक्षा और असुरक्षा की भावना-
रंगों में रसायनों का उपयोग, शराब के नशे में हुड़दंग, छेड़छाड़ और जबरन रंग लगाने की घटनाओं ने लोगों, खासकर महिलाओं और बुजुर्गों को घरों में रहने के लिए मजबूर किया है।
व्यावसायीकरण-
त्योहार अब बाजार आधारित होते जा रहे हैं। महंगे रंग, डीजे पार्टियां, क्लब होली और थीम इवेंट्स ने पारंपरिक सादगी को पीछे छोड़ दिया है। त्योहार का आत्मीय रूप कम और दिखावा ज्यादा हो गया है।
पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं
पहले प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता था, जो त्वचा और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित थे। अब केमिकल रंग, प्लास्टिक गुब्बारे और पानी की बर्बादी ने त्योहार को पर्यावरण के लिए हानिकारक बना दिया है।
इसके कारण:
त्वचा रोग
आंखों में जलन
जल संकट
कचरे की समस्या
लोग पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होकर होली से दूरी बनाने लगे हैं।

क्या सचमुच बेरंग हो रही है होली?
होली पूरी तरह बेरंग नहीं हुई है, लेकिन उसका स्वरूप जरूर बदल गया है। अब सामूहिकता की जगह व्यक्तिगत उत्सव बढ़ गया है। रिश्तों की गहराई कम और औपचारिकता अधिक हो गई है।
जहां पहले “चलो सब मिलकर होली खेलें” का भाव था, अब “किसी तरह दिन निकल जाए” जैसी सोच पनप रही है। यही मानसिक दूरी त्योहार के रंगों को फीका कर रही है।
समाधान: फिर से रंगीन कैसे बने होली?
होली की असली आत्मा को लौटाने के लिए समाज को सामूहिक प्रयास करना होगा:
प्राकृतिक और सुरक्षित रंगों का उपयोग
नशामुक्त और शालीन उत्सव
परिवार और पड़ोसियों के साथ मिलन
पारंपरिक गीत-संगीत और लोक संस्कृति को बढ़ावा
सोशल मीडिया की बजाय प्रत्यक्ष संवाद
महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के सम्मान का ध्यान
अगर त्योहार को प्रेम, सम्मान और मर्यादा के साथ मनाया जाए, तो होली फिर से दिलों को जोड़ने का माध्यम बन सकती है।
निष्कर्षतः होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि दिलों के मिलन का पर्व है। बदलते दौर में इसकी आत्मा को बचाए रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम रिश्तों में रंग भरना भूल गए, तो त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख बनकर रह जाएगा।
जरूरत है कि हम फिर से अपनापन, भाईचारा और मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता दें—तभी होली के रंग सचमुच हमारे जीवन को भी रंगीन बना पाएंगे।
जब दिल मिलेंगे, तभी रंग खिलेंगे — तभी सच्चे अर्थों में होली मन पाएंगे।
















