-पछनिया: लोकपरंपरा, शीतला माता की भक्ति और बचपन की यादों से जुड़ी एक अनूठी विरासत
श्याम किशोर ✍️
आज की नई पीढ़ी के लिए ‘पछनिया’ शब्द भले ही अनजान हो, लेकिन पचास वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए यह उनके बचपन की यादों से जुड़ा एक परिचित नाम है। उस दौर में चेचक से बचाव के लिए टीका लगवाने की परंपरा और गांव-गांव घूमने वाले पछनिया की भूमिका ग्रामीण जीवन का हिस्सा हुआ करती थी। आज भी कई बुजुर्गों की बांह पर मौजूद पुराने निशान उस समय की याद दिलाते हैं।
पुराने समय में पछनिया के रूप में पहचाने जाने वाले लोग गांव-गांव घूमते थे। लोकस्मृतियों के अनुसार, वे बांह पर सुई से टीका लगाते थे, जिसके बाद वहां छोटा-सा घाव बनता था और ठीक होने पर उसका निशान लंबे समय तक बना रहता था। हालांकि, उस दौर की टीकाकरण पद्धति और आज की आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में काफी अंतर है। चेचक और टीबी से बचाव के टीके भी अलग-अलग हैं।
लोकमान्यता के अनुसार, पछनिया का संबंध माली समाज के कुछ पारंपरिक समूहों से भी जोड़ा जाता रहा है। उनकी पहचान केवल एक पारंपरिक कार्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे ग्रामीण लोकजीवन और धार्मिक आस्था के भी परिचित चेहरे हुआ करते थे।
शीतला माता की महिमा का गुणगान करते हुए वे झाल-करताल बजाकर भजन गाते थे। गांव की गलियों में गूंजते भक्ति गीत, घर-घर उनका पहुंचना और लोगों का श्रद्धापूर्वक दान-दक्षिणा देना उस समय की ग्रामीण संस्कृति की विशेष पहचान थी। चेचक जैसी गंभीर बीमारी का भय, शीतला माता के प्रति आस्था और लोकपरंपराओं का संगम ग्रामीण समाज के जीवन की एक अनूठी तस्वीर प्रस्तुत करता था।

समय के साथ चिकित्सा विज्ञान ने बड़ी प्रगति की। चेचक के उन्मूलन में वैश्विक स्तर पर ऐतिहासिक सफलता मिली और आधुनिक टीकाकरण व्यवस्था ने पुराने तरीकों की जगह ले ली। इसके साथ ही पछनिया की पारंपरिक भूमिका भी धीरे-धीरे अतीत की स्मृतियों में सिमटती चली गई।
फिर भी, पछनिया से जुड़ी यादें हमारे ग्रामीण सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये यादें बताती हैं कि लोकजीवन में परंपराओं, धार्मिक आस्था, संगीत और सामुदायिक सहभागिता की कितनी अहम भूमिका रही है।
किसी समाज की पहचान केवल उसके पुराने व्यवसाय से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत, कला, संस्कृति और बदलते समय के साथ आगे बढ़ने की क्षमता से भी होती है। माली समाज सहित उन सभी समुदायों के पारंपरिक योगदान को सम्मान के साथ याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने ग्रामीण जीवन और लोकसंस्कृति को अपनी विशिष्ट पहचान दी।
कभी बांह पर बना वह छोटा-सा निशान, कभी झाल-करताल की मधुर धुन और कभी शीतला माता के भजन—ये सब बीते समय की ऐसी यादें हैं, जो पीढ़ियों को अपने अतीत से जोड़ती हैं।
आइए, अपनी लोकपरंपराओं को संजोएं, समाज के पारंपरिक योगदान का सम्मान करें और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराएं।











