–औंधे मुंह गिरे आलू के दाम, मुजफ्फरपुर के किसान संकट में
मुजफ्फरपुर/बन्दरा। दीपक कुमार तिवारी। कृषि प्रधान देश में अन्नदाता कहे जाने वाले किसान आज भी अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए जूझ रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण मुजफ्फरपुर के बन्दरा क्षेत्र में देखने को मिल रहा है, जहां आलू उत्पादक किसानों की हालत बेहद खराब हो गई है। खेतों में मेहनत से तैयार की गई आलू की फसल का बाजार भाव अचानक गिर जाने से किसानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
जानकारी के अनुसार, दो महीने पहले तक बाजार में 20 रुपये प्रति किलो बिकने वाला आलू अब महज 5 रुपये प्रति किलो की दर पर भी खरीदार नहीं पा रहा है। इससे किसानों में मायूसी छा गई है और वे भारी नुकसान झेलने को मजबूर हैं।
किसानों का कहना है कि इस बार आलू की खेती में लागत काफी अधिक आई। बुवाई के समय बीज की कीमत 1500 से 2000 रुपये प्रति क्विंटल तक थी। इसके अलावा जुताई, मजदूरी, खाद, कीटनाशक, सिंचाई समेत अन्य खर्चों को जोड़ने पर कुल लागत लगभग 1000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई। लेकिन बाजार में व्यापारी सिर्फ 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से आलू खरीद रहे हैं, जिससे किसानों को लागत का आधा भी नहीं मिल पा रहा है।

कृषि क्षेत्र की यह समस्या नई नहीं है। उत्पादन अधिक होने पर अक्सर फसलों के दाम गिर जाते हैं, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं, कुछ समय बाद यही उत्पाद बाजार में ऊंचे दामों पर बिकते हैं, जिसका फायदा बिचौलिये और व्यापारी उठाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या की जड़ कृषि व्यवस्था की कमजोरियां हैं। यदि क्षेत्र में पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज की सुविधा हो और किसानों को अपनी उपज सुरक्षित रखने का विकल्प मिले, तो वे मजबूरी में औने-पौने दाम पर फसल बेचने से बच सकते हैं। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी प्रभावी व्यवस्था भी किसानों को राहत दे सकती है।
किसानों ने सरकार से मांग की है कि कृषि उत्पादों के लिए स्थिर और न्यायपूर्ण बाजार व्यवस्था बनाई जाए, ताकि उन्हें उनकी मेहनत के अनुरूप लाभकारी मूल्य मिल सके।
आलू उत्पादक किसानों की वर्तमान स्थिति एक चेतावनी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो खेती से किसानों का मोहभंग हो सकता है और देश की खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा सकता है।











