KBC के विजेता सुशील कुमार की जिंदगी में आया बुरा दौर,पांच साल में हो गये कंगाल!



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पटना।संवाददाता।




टेलीविजन का रियलिटी गेम शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जल्द ही सोनी टीवी पर शुरू होने वाला है।बिहार के सुशील कुमार ने केबीसी शो के पांचवें संस्करण के विजेता होकर करोड़पति बने हैं। लेकिन, करोड़पति सुशील कुमार अब अपनी जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं।उन्होंने फेसबुक के जरिये जिंदगी के मुश्किल हालात पर खुलकर बात की है।उन्होंने लिखा है कि 2015-16 मेरे जीवन का सबसे चुनौती पूर्ण समय था।कुछ बुझाइए नहीं रहा था, क्या करें. लोकल सेलेब्रिटी होने के कारण महीने में दस से पंद्रह दिन बिहार में कहीं-न-कहीं कार्यक्रम लगा ही रहता था।

इसलिए पढ़ाई-लिखाई धीरे-धीरे दूर जाती रही।उस समय मीडिया को लेकर मैं बहुत ज्यादा सीरियस रहा करता था और मीडिया भी कुछ-कुछ दिन पर पूछ देती थी कि आप क्या कर रहे हैं।इसको लेकर मैं बिना अनुभव के कभी ये बिजनेस, कभी वो करता था।मैं मीडिया में बता सकूं कि मैं बेकार नही हूं।जिसका परिणाम ये होता था कि वो बिजनेस कुछ दिन बाद डूब जाता था।इसके साथ केबीसी के बाद मैं दानवीर बन गया था और गुप्त दान का चस्का लग गया था।महीने में लगभग 50 हजार से ज्यादा ऐसे ही कार्यों में चला जाता था।इस कारण कुछ चालू टाइप के लोग भी जुड़ गये थे और हम गाहे-बगाहे खूब ठगा भी जाते थे, जो दान करने के बहुत दिन बाद पता चलता था।

पत्नी के साथ धीरे-धीरे खराब होते जा रहे थे संबंध:
सुशील कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि ”वो अक्सर कहा करती थी कि आपको सही-गलत लोगों की पहचान नहीं है और भविष्य की कोई चिंता नही है। ये सब बात सुन कर हमको लगता था कि हमको नहीं समझ पा रही है।इस बात पर खूब झगड़ा हो जाया करता था।हालांकि, इसके साथ कुछ अच्छी चीजें भी हो रही थी।दिल्ली में मैंने कुछ कार ले कर अपने एक मित्र के साथ चलवाने लगा था।इस कारण मुझे लगभग हर महीने कुछ दिनों दिल्ली आना पड़ता था। इसी क्रम में मेरा परिचय कुछ जामिया मिलिया में मीडिया की पढ़ाई कर रहे लड़कों से हुआ। फिर आईआईएमसी में पढ़ाई कर रहे लड़के, फिर उनके सीनियर, फिर जेएनयू में रिसर्च कर रहे लड़के, कुछ थियेटर आर्टिस्ट आदि से परिचय हुआ। जब ये लोग किसी विषय पर बात करते थे, तो लगता था कि अरे! मैं तो कुएं का मेढ़क हूं. मैं तो बहुत चीजों के बारे में कुछ नहीं जानता.”

शराब और सिगरेट की लगी साथ:
उन्होंने लिखा है कि ”इन लोगों के साथ बैठना ही होता था दारू और सिगरेट के साथ. एक समय ऐसा आया कि अगर सात दिन रुक गया, तो सातों दिन इस तरह के सात ग्रुप के साथ अलग-अलग बैठकी हो जाती थी।इनलोगों को सुनना बहुत अच्छा लगता था।ये लोग जो भी बात करते थे, मेरे लिए सब नया नया लगता था।बाद में इन लोगों की संगत का ये असर हुआ कि मीडिया को लेकर जो मैं बहुत ज्यादा सीरियस रहा करता था, वो सीरियसनेस धीरे-धीरे कम हो गयी।जब भी घर पर रहते थे, तो रोज एक सिनेमा देखते थे. हमारे यहां सिनेमा डाउनलोड की दुकान होती है, जो पांच से दस रुपये में हॉलीवुड का कोई भी सिनेमा हिंदी में डब या कोई भी हिंदी फिल्म उपलब्ध करा देती है।

कैसे आयी कंगाली की खबर:
उस रात प्यासा फिल्म देख रहा था और उस फिल्म का क्लाइमेक्स चल रहा था, जिसमें माला सिन्हा से गुरुदत्त साहब कर रहे हैं कि मैं वो विजय नही हूं, वो विजय मर चुका।उसी वक्त पत्नी कमरे में आयी और चिल्लाने लगी कि एक ही फिल्म बार-बार देखने से आप पागल हो जाइयेगा और और यही देखना है, तो मेरे रूम में मत रहिये, जाइये बाहर. इस बात से हमको दुःख इसलिए हुआ कि लगभग एक माह से बातचीत बंद थी और बोला भी, ऐसे की आगे भी बात करने की हिम्मत ना रही और लैपटॉप को बंद किये और मोहल्ले में चुपचाप टहलने लगे.” अभी टहल ही रहे थे, तभी एक अंग्रेजी अखबार के पत्रकार महोदय का फोन आया और कुछ देर तक मैंने ठीक-ठाक बात की। बाद में उन्होंने कुछ ऐसा पूछा, जिससे मुझे चिढ़ हो गयी और मैंने कह दिया कि मेरे सभी पैसे खत्म हो गये और दो गाय पाले हुए हैं।उसी का दूध बेचकर गुजारा करते हैं।उसके बाद जो उस न्यूज का असर हुआ, उससे आप सभी तो वाकिफ होंगे ही।
इसी बीच एक दिन पत्नी से खूब झगड़ा हो गया और वो अपने मायके चली गयी।बात तलाक लेने तक पहुंच गई।मुझे ये एहसास हुआ कि अगर रिश्ता बचाना है, तो मुझे बाहर जाना होगा और फिल्म निर्देशक बनने का सपना लेकर चुपचाप बिल्कुल नये परिचय के साथ मैं आ गया। अपने एक परिचित प्रोड्यूसर मित्र से बात करके जब मैंने अपनी बात कही, तो उन्होंने फिल्म संबंधी कुछ टेक्निकल बातें पूछी, जिसको मैं नहीं बता पाया, तो उन्होंने कहा कि कुछ दिन टीवी सीरियल में कर लीजिए।बाद में हम किसी फिल्म डायरेक्टर के पास रखवा देंगे. फिर एक बड़े प्रोडक्शन हाउस में आकर काम करने लगा।वहां पर कहानी, स्क्रीन प्ले, डायलॉग कॉपी, प्रॉप कॉस्टयूम, कंटीन्यूटी और ना जाने क्या करने देखने समझने का मौका मिला।उसके बाद मेरा मन वहां से बेचैन होने लगा।वहां पर बस तीन ही जगह आंगन, किचन, बेडरूम ज्यादातर शूट होता था और चाह कर भी मन नहीं लगा पाते थे।

उस खबर ने अपना असर दिखाया, जितने चालू टाइप के लोग थे, वे अब कन्नी काटने लगे. मुझे लोगों ने अब कार्यक्रमो में बुलाना बंद कर दिया और तब मुझे समय मिला कि अब मुझे क्या करना चाहिए।उस समय खूब सिनेमा देखते थे।लगभग सभी नेशनल अवॉर्ड विनिंग फिल्म, ऑस्कर विनिंग फिल्म, ऋत्विक घटक और सत्यजीत रॉय की फिल्म देख चुके थे और मन में फिल्म निर्देशक बनने का सपना कुलबुलाने लगा था।इसी बीच एक दिन पत्नी से खूब झगड़ा हो गया और वो अपने मायके चली गयी।बात तलाक लेने तक पहुंच गयी. तब मुझे ये एहसास हुआ कि अगर रिश्ता बचाना है, तो मुझे बाहर जाना होगा और फिल्म निर्देशक बनने का सपना लेकर चुपचाप बिल्कुल नये परिचय के साथ मैं आ गया।अपने एक परिचित प्रोड्यूसर मित्र से बात करके जब मैंने अपनी बात कही, तो उन्होंने फिल्म संबंधी कुछ टेक्निकल बातें पूछी, जिसको मैं नहीं बता पाया, तो उन्होंने कहा कि कुछ दिन टीवी सीरियल में कर लीजिए. बाद में हम किसी फिल्म डायरेक्टर के पास रखवा देंगे. फिर एक बड़े प्रोडक्शन हाउस में आकर काम करने लगा।वहां पर कहानी, स्क्रीन प्ले, डायलॉग कॉपी, प्रॉप कॉस्टयूम, कंटीन्यूटी और ना जाने क्या करने देखने समझने का मौका मिला।उसके बाद मेरा मन वहां से बेचैन होने लगा।वहां पर बस तीन ही जगह आंगन, किचन, बेडरूम ज्यादातर शूट होता था और चाह कर भी मन नहीं लगा पाते थे।

हम तो मुंबई फिल्म निर्देशक बनने का सपना लेकर आये थे और एक दिन वो भी छोड़ कर अपने एक परिचित गीतकार मित्र के साथ उसके रूम में रहने लगा और दिन भर लैपटॉप पर सिनेमा देखते-देखते और दिल्ली पुस्तक मेले से जो एक सूटकेस भर के किताब लाये थे, उन किताबों को पढ़ते रहते. लगभग छह महीने लगातार यही करता रहा और दिन भर में एक डब्बा सिगरेट खत्म कर देते थे, पूरा कमरा हमेशा धुएं से भरा रहता था।दिन भर अकेले ही रहने से और पढ़ने-लिखने से मुझे खुद के अंदर निष्पक्षता से झांकने का मौका मिला और मुझे ये एहसास हुआ कि मैं मुंबई में कोई डायरेक्टर बनने नहीं आया हुआ। मैं एक भगोड़ा हूं, जो सच्चाई से भाग रहा है।असली खुशी अपने मन का काम करने में है।घमंड को कभी शांत नहीं किया जा सकता।बड़े होने से हजार गुना ठीक है, अच्छा इंसान होना।

छोटी-छोटी चीजों में छुपी होती है खुशियां:
जितना हो सके देश समाज का भला करना, जिसकी शुरुआत अपने घर/गांव से की जानी चाहिए।इसी दौरान मैंने तीन कहानी लिखी। जिसमें से एक कहानी एक प्रोडक्शन हाउस को पसंद भी आयी और उसके लिए मुझे लगभग 20 हजार रुपये भी मिले. ( पैसा देते वक्त मुझसे कहा गया कि इस फिल्म का आईडिया बहुत अच्छा है।कहानी पर काफी काम करना पड़ेगा, क्लाइमेक्स भी ठीक नहीं है, आदि-आदि. और इसके लिए आपको बहुत ज्यादा पैसा हमलोगों ने पे कर दिया है) इसके बाद मैं मुंबई से घर आ गया और टीचर की तैयारी की और पास भी हो गया।साथ ही अब पर्यावरण से संबंधित बहुत सारे कार्य करता हूं, जिसके कारण मुझे एक अजीब तरह की शांति का एहसास होता है।साथ ही अंतिम बार मैंने शराब मार्च 2016 में पी थी।उसके बाद पिछले साल सिगरेट भी खुद-ब-खुद छूट गया।अब तो जीवन मे हमेशा एक नया उत्साह महसूस होता है और बस ईश्वर से प्रार्थना है कि जीवन भर मुझे ऐसे ही पर्यावरण की सेवा करने का मौका मिलता रहे, इसी में मुझे जीवन का सच्चा आनंद मिलता है।बस यही सोचते हैं कि जीवन की जरूरतें, जितनी कम हो सके रखनी चाहिए, बस इतना ही कमाना है कि जो जरूरतें वो पूरी हो जाये और बाकी बचे समय में पर्यावरण के लिए ऐसे ही छोटे स्तर पर कुछ कुछ करते रहना है।

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