-रश्मिरथी सामाजिक समरसता का दर्शन, 75 वर्ष बाद भी उतनी ही प्रासंगिक : संजय पंकज
मुजफ्फरपुर/मयंक। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ के लेखन एवं प्रकाशन की हीरक जयंती के अवसर पर हनुमान नगर, माड़ीपुर स्थित पार्वती सदन में ‘दिनकर की रश्मिरथी : एक संवाद’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अशोक शर्मा ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. संजय पंकज ने अपने विचार रखे।
मुख्य वक्ता डॉ. संजय पंकज ने कहा कि दिनकर केवल राष्ट्रीय चेतना के ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के भी बड़े कवि थे। उन्होंने कहा कि ‘रश्मिरथी’ सामाजिक समरसता का दर्शन प्रस्तुत करने वाली अतुलनीय और कालजयी कृति है, जो जाति और सत्ता के पाखंड पर प्रहार करते हुए वैश्विक मानवीय मूल्यों का समर्थन करती है।
उन्होंने कहा कि महाभारत के वीर योद्धा कर्ण के माध्यम से दिनकर ने यह संदेश दिया कि महानता किसी वंश या कुल की मोहताज नहीं होती, बल्कि व्यक्ति के कर्म, प्रतिभा और आचरण उसे महान बनाते हैं। कर्ण का साहस, दानशीलता, मित्रता और कृतज्ञता उसे एक विराट चरित्र के रूप में स्थापित करती है।
डॉ. पंकज ने कहा कि रश्मिरथी केवल वीरता की गाथा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों और भारतीय सांस्कृतिक दर्शन का जीवंत दस्तावेज है। भाव, भाषा और विचार की दृष्टि से यह कृति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास, दिल्ली के तत्वावधान में पूरे देश में ‘रश्मिरथी पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है।

डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि दिनकर ने व्यक्ति के आंतरिक गुणों को सर्वोपरि मानते हुए समाज को जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि दिनकर की रचनात्मक क्षमता का प्रमाण है कि उन्होंने किसी पात्र को खलनायक नहीं बनाया, बल्कि कर्ण को एक महान नायक के रूप में प्रतिष्ठित किया।
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि देश को प्रथम राष्ट्रपति और राष्ट्रकवि देने का गौरव मुजफ्फरपुर को प्राप्त है। उन्होंने बताया कि दिनकर ने यहीं रहकर रश्मिरथी का लेखन और प्रकाशन किया था तथा इसके प्रकाशन के 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। उन्होंने इस कृति पर व्यापक संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रो. अरुण कुमार सिंह ने कहा कि दिनकर आज भी जन-जन के प्रिय कवि हैं और उनकी पंक्तियां देशभर में उद्धृत की जाती हैं। उन्होंने याद दिलाया कि दिनकर लंगट सिंह महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक रहे और मुजफ्फरपुर का दायित्व है कि उनके साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
एच.एल. गुप्ता ने कहा कि अक्सर उद्धृत की जाने वाली प्रसिद्ध पंक्ति “जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है” रश्मिरथी की ही पंक्ति है। इस अवसर पर डॉ. संजय पंकज ने रश्मिरथी के कई अंशों का भावपूर्ण पाठ भी किया।
कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए ऑनेस्ट रिपोर्टर के संपादक प्रेमभूषण ने कहा कि अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत राष्ट्रकवि दिनकर का साहित्यिक व्यक्तित्व वैश्विक है। उन्होंने कहा कि रश्मिरथी आज भी बुद्धिजीवियों से लेकर आमजन तक की जुबान पर अपनी अमर पंक्तियों के साथ जीवंत बनी हुई है।












