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कच्चा तेल 56% सस्ता, फिर भी पेट्रोल-डीजल के दाम जस के तस; उपभोक्ताओं को राहत का इंतजार

-कच्चा तेल 56% सस्ता, फिर भी पेट्रोल-डीजल के दाम जस के तस; उपभोक्ताओं को राहत का इंतजार

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन इसका फायदा अब तक देश के आम उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाया है। अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा इंडियन बास्केट क्रूड ऑयल अब गिरकर 68.69 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, जो अपने उच्चतम स्तर 157 डॉलर प्रति बैरल से करीब 56 प्रतिशत कम है। इसके बावजूद पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बड़ी कटौती नहीं की गई है।
वित्तीय संस्था डीएएम कैपिटल की रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा कच्चे तेल की कीमतों पर तेल विपणन कंपनियां पेट्रोल पर लगभग 10.5 रुपये और डीजल पर करीब 11 रुपये प्रति लीटर का मार्जिन कमा रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1 जून से कच्चे तेल की कीमत 87 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बनी हुई है, जिस स्तर पर कंपनियां सामान्यतः ‘ब्रेक ईवन’ की स्थिति में रहती हैं। ऐसे में पिछले कई सप्ताह से कंपनियां लाभ में कारोबार कर रही हैं।


विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में आई बड़ी गिरावट का लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच रहा है। तेल कंपनियों का तर्क है कि वे पहले हुए घाटे की भरपाई कर रही हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में संभावित उतार-चढ़ाव को देखते हुए कीमतों में जल्दबाजी में कटौती नहीं करना चाहतीं। हालांकि आर्थिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में कंपनियां उपभोक्ताओं को कुछ राहत देने की स्थिति में हैं।
पिछले वर्षों के आंकड़े भी इस अंतर को स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2018 में जब कच्चा तेल करीब 80 डॉलर प्रति बैरल था, तब दिल्ली में पेट्रोल लगभग 72 रुपये प्रति लीटर बिक रहा था। वर्ष 2020 में कच्चे तेल की कीमत 43 डॉलर प्रति बैरल तक गिरने के बावजूद खुदरा कीमतों में उसी अनुपात में कमी नहीं आई। वहीं 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने पर पेट्रोल-डीजल के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए थे।
फिलहाल दिल्ली में पेट्रोल की कीमत करीब 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर बनी हुई है, जबकि कच्चा तेल कई महीनों से अपेक्षाकृत सस्ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ईंधन की कीमत तय करने में केवल कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत ही नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के टैक्स, परिवहन एवं विपणन लागत, पुराने घाटे और भविष्य के बाजार जोखिम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद आम जनता को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अभी तक अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी है।