-पीएम की ईंधन बचत अपील के बीच बिहार में मंत्रियों के काफिले पर उठे सवाल, वीडियो चर्चा में
दीपक कुमार तिवारी।पटना।
बिहार में मंत्रियों के लंबे वाहन काफिलों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा संकट के मद्देनजर देशवासियों से ईंधन की खपत कम करने की अपील के बाद कई राज्यों में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने ईंधन बचाने के लिए अलग-अलग पहल शुरू की हैं। कहीं नेताओं ने अपने काफिले छोटे किए, तो कहीं सार्वजनिक परिवहन, ई-रिक्शा, इलेक्ट्रिक बाइक और साइकिल का उपयोग बढ़ाने की पहल देखने को मिली।
हालांकि बिहार से सामने आई कुछ तस्वीरों ने इस मुद्दे पर नई चर्चा छेड़ दी है। आरोप है कि प्रधानमंत्री की अपील के बावजूद कुछ जनप्रतिनिधि लंबे वाहन काफिलों के साथ यात्रा करते दिखाई दिए, जिससे ईंधन बचत अभियान को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
पश्चिम चंपारण जिले में आयोजित एक सहयोग शिविर के दौरान बिहार सरकार के मंत्री लखेंद्र कुमार रौशन के बेतिया पहुंचने पर उनके साथ वाहनों का लंबा काफिला देखा गया। काफिले को लेकर चर्चा शुरू होने के बाद मंत्री ने मीडिया के सामने अपनी सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि उनके निजी काफिले में केवल दो वाहन शामिल हैं, जबकि बाकी वाहन जिला प्रशासन के हैं।

मंत्री ने कहा कि प्रशासनिक व्यवस्थाओं के तहत कई वाहन सुरक्षा और कार्यक्रम संचालन से जुड़े होते हैं, इसलिए पूरे काफिले को उनके निजी उपयोग से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि कैमरे के सामने वाहन रोककर सफाई देने का उनका अंदाज राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।
वहीं समस्तीपुर में प्रभारी मंत्री दामोदर रावत के दौरे के दौरान भी लंबा वाहन काफिला चर्चा में रहा। सहयोग कार्यक्रम के सिलसिले में परिसदन पहुंचे मंत्री के साथ प्रशासनिक अधिकारियों, सुरक्षा वाहनों, एंबुलेंस और अन्य गाड़ियों की लंबी कतार देखी गई। स्थानीय लोगों के अनुसार सड़क पर निकले काफिले ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
एक ओर जहां ईंधन बचत और संसाधनों के सीमित उपयोग को लेकर लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों के बड़े काफिले अब राजनीतिक बहस का मुद्दा बनते जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि सरकारी स्तर पर ही ईंधन बचत के संदेश को व्यवहार में नहीं उतारा जाएगा, तो आम लोगों तक इसका प्रभाव कितना पहुंचेगा।












