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मध्य-पूर्व में जंग का असर: बिहार के गांवों में टूटी शादियां, खाड़ी में फंसे प्रवासियों की बढ़ी बेचैनी

–मध्य-पूर्व में जंग का असर: बिहार के गांवों में टूटी शादियां, खाड़ी में फंसे प्रवासियों की बढ़ी बेचैनी

मुजफ्फरपुर/गया। मध्य-पूर्व में जारी तनाव ने अब सीमाओं को पार कर हजारों किलोमीटर दूर बसे बिहार के गांवों तक असर डालना शुरू कर दिया है। अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच 28 फरवरी से जारी टकराव ने खाड़ी क्षेत्र में हालात बिगाड़ दिए हैं, जिसका सीधा असर वहां काम कर रहे बिहार के प्रवासी मजदूरों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है।
मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच कई देशों ने एहतियातन हवाई सेवाएं बाधित कर दी हैं। उड़ानें रद्द होने से सैकड़ों प्रवासी अपने घर नहीं लौट पा रहे हैं। त्योहार और शादियों के इस मौसम में घर लौटने का सपना देख रहे लोगों के लिए यह स्थिति बेहद पीड़ादायक बन गई है।
गया जिले के खंडेल गांव में हालात खासे चिंताजनक हैं। गांव के अधिकांश परिवारों के सदस्य खाड़ी देशों में काम करते हैं। हर साल की तरह इस बार भी कई घरों में शादियां तय थीं, लेकिन जंग ने खुशियों पर ग्रहण लगा दिया है।
एक परिवार में 30 मार्च को बेटे की शादी तय है। निमंत्रण पत्र बांटे जा चुके हैं, लेकिन दूल्हा कतर में फंसा हुआ है। उसकी दो बार फ्लाइट रद्द हो चुकी है। परिजन अब भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वह समय पर घर पहुंच जाए। दूल्हे के पिता ने भावुक होकर कहा, “अगर बेटा आ जाए तो बारात जरूर निकलेगी… बस दुआ कर रहे हैं।”


स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि शादी की तैयारियों में भी बदलाव करना पड़ रहा है। गैस सिलेंडर की कमी के चलते कई घरों में लकड़ी के चूल्हे पर भोजन बनाने की तैयारी की जा रही है। कुछ परिवारों ने सादगी से शादी करने या कार्यक्रम सीमित करने का निर्णय लिया है।
गांव के जनप्रतिनिधियों के अनुसार, कई लोग अब ऑनलाइन निकाह जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं। एक ही गांव में दो शादियों के दूल्हे बहरीन और कतर में फंसे हुए हैं, जिनकी वापसी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
उधर, खाड़ी देशों में फंसे प्रवासी भय के माहौल में दिन-रात गुजार रहे हैं। कई लोग बंकरों में शरण लेने को मजबूर हैं, जबकि कुछ ने भारी खर्च उठाकर किसी तरह वतन वापसी की है।
यह जंग सिर्फ सीमाओं की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि उन परिवारों के सपनों पर गहरा असर डाल रही है, जिनकी खुशियां अब इंतजार और अनिश्चितता में बदल गई हैं। बिहार के गांवों में जहां शहनाइयों की गूंज होनी थी, वहां अब चिंता और मायूसी का माहौल है।