क्यों टांगे गए थे सूली पर यीशु,यह है 3 दिन बाद जिंदा हाेने की पूरी कहानी!

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आज 10 अप्रैल को गुड फ्राइडे है. इसे पुण्य शुक्रवार भी कहा जाता है.आज का दिन ईसाई धर्म को मानने वालों के लिए महत्वपुर्ण दिन होता है. आज के दिन को ईसाई धर्म के अनुयायी शोक दिवस के रुप में मनाते हैं क्योंकि कहा जाता है कि प्रभु यीशु मसीह को आज के दिन ही सूली पर टांग दिया गया था. और उसके ठीक तीन दिन बाद रविवार को वो वापस जीवित हो गए थे.कहा जाता है कि, फ्राइडे को ईसा मसीह ने बलिदान दिया और तीन दिन बाद यानि रविवार को वे पुनः जीवित हो गए थे. इसे ‘ईस्टर संडे’ के नाम से जाना जाता है. आइये जानते हैं उस पूरी कहानी को जब सूली पर चढ़ाए गए थे यीशु।ईसाई धर्म की मान्य पुस्तकों के अनुसार, यीशु को मंदिर के प्रहरियों ने गेथ्सेमाने गार्डन में उनके शिष्य यहूदा इस्करियोती की अगुवाई में गिरफ्तार किया था.कहा जाता है कि यहूदा ने चांदी के 30 टुकड़ों के बदले यीशु से विश्वासघात किया और मंदिर के प्रहरियों से कहा कि वह जिसे चुम्बन लेगा उसे ही उन्हें गिरफ्तार करना है.यह एक तरह का इशारा था.यीशु को गिरफ्तार कर अन्नास के घर लाया गया,जो तत्कालीन उच्च पुरोहित काइयाफस का ससुर था.वहाँ उनसे पूछताछ की गयी किन्तु उसका कोई खास नतीजा नहीं निकला जिसके बाद उन्हें उच्च पुरोहित काइयाफस के पास भेज दिया गया,जहां सैन्हेद्रिन इकट्ठे थे।


कई गवाहों ने यीशू के खिलाफ विरोधा में बयान दिये जिसका यीशु ने कुछ भी जवाब नहीं दिया.अंत में उच्च पुरोहित ने यीशु को पवित्र शपथ लेकर उत्तर देने का आदेश देते हुए कहा – “मैं, तुम्हें ईश्वर के नाम का वास्ता देकर आदेश देता हूं कि तुम हमें बताओं कि क्या तुम ही एकमात्र अभिषिक्त व्यक्ति,परमेश्वर के पुत्र हो?” यीशू ने सकारात्मक उत्तर देते हुए कहा कि “तुमने कहा है और समय आने पर तुम देखोगे कि स्वर्ग के बादलों के बीच मनुष्य का पुत्र सर्वशक्तिमान की दाहिनी ओर बैठा है।” उच्च पुरोहित ने यीशु को ईश्वर की निंदा का दोषी ठहराया और सर्व सम्मति से यीशु को मौत की सज़ा सुनायी.पीटर ने भी पूछताछ के दौरान उसने यीशु को पहचानने से तीन बार इनकार किया. कहा जाता है कि यीशु पहले से ही जानते थे कि पीटर उन्हें तीन बार पहचानने से इनकार करेगा.
सुबह पूरी परिषद यीशु को साथ लेकर रोमन राज्यपाल पोंटीयस पायलट के पास पहुंची. उन पर आरोप लगाये गये कि वह देशद्रोही हैं, उन्होंने सीज़र के करों का विरोध किया है और स्वयं को राजा घोषित किया है .पायलट ने यहूदी नेताओं को यह जिम्मेदारी दी कि वे यीशु को अपने कानून के अनुसार फांसी दें किन्तु यहूदी नेताओं ने कहा कि रोमन लोगों ने उन्हें प्राणदंड देने की अनुमति नहीं दी है.पायलट ने यीशु से पूछताछ करने के बाद सभा से कहा कि यीशु को सजा देने का कोई आधार नहीं है. यह जानकर कि यीशु गैलिली के निवासी हैं ,पायलट ने इस मामले को गैलिली के राजा हेरोड को सौंपा, जो यरूशलेम में पासोवर की दावत के लिए गये थे.हेरोड ने यीशू से सवाल किये पर उसे कोई जवाब नहीं मिला. हेरोड ने यीशु को पायलट के पास वापस भेज दिया. पायलट ने सभा से कहा कि न तो उसने और न ही हेरोड ने यीशु में कोई दोष पाया है. पायलट ने निश्चय किया की यीशु को कोड़े मारकर रिहा कर दिया जाये।


रोम में पासओभर के भोज के दौरान यह प्रथा थी कि यहूदियों के अनुरोध पर एक कैदी को रिहा कर दिया जाता था. पायलट ने लोगों से पूछा कि वे किसको रिहा करना चाहते हैं.मुख्य पुरोहित के निर्देश पर लोगों ने कहा कि वे बराब्बस को रिहा करना चाहते हैं,जो एक विद्रोह के दौरान हत्या के जुर्म जेल में है.पायलट ने पूछा कि वे यीशु के साथ किस प्रकार का सलूक चाहेंगे और उन लोगों ने मांग की, ” उसे सूली पर लटका दो”.पायलट की पत्नी ने उसी दिन यीशु को सपने में देखा था, उसने पायलट को आगाह कर दिया कि “इस धार्मिक व्यक्ति के साथ कोई सरोकार न रखे”.पायलट ने यीशु को कोड़े मरवाए और भीड़ के सामने ला कर उसे रिहा कर दिया. मुख्य पुरोहित ने पायलट को एक नये आरोप की जानकारी दी कि यीशु स्वयं को “परमेश्वर का पुत्र होने का दावा” करता है इसलिए उसे मौत की सज़ा सुनायी जाये.इससे पायलट भयभीत हो जाता है और यीशु को वापस महल के अन्दर ले जाता है तथा उनसे जानना चाहता है कि वह कहां से आये हैं।भीड़ के सामने आखिरी बार आकर, पायलट यीशु के निर्दोष होने की घोषणा करता है और यह दिखाने के लिए कि इस दंडविधान में उसकी कोई भूमिका नहीं है, उसने पानी से अपने हाथ धोये. आखिरकार, पायलट ने दंगे से बचने के लिए यीशु को सूली पर चढ़ाने के लिए सौंप दिया .दंडादेश में लिखा था “नासरत का यीशु, यहूदियों का राजा.”सायरीन के साइमन की सहायता से यीशु अपनी सूली को स्वयं ढोते हुए वधस्थल तक ले गये, जहां उन्हें सूली पर चढ़ाया गया, उस स्थान को हिब्रू में कपाल का स्थान या “गोलगोथा” और लैटिन में कैलवरी कहते हैं.
यीशु छह घंटे तक सूली पर यातना सहते रहे.सूली पर लटकाये रखे जाने के आखिरी तीन घंटों के दौरान दोपहर से अपराह्न 3 बजे तक पूरे देश में अंधेरा छाया रहा.एक जोरदार चीख के बाद यीशु ने अपने प्राण त्याग दिये.उसी समय एक भूकंप आया, कब्रें टूट कर खुल गयीं और इस मंदिर का पर्दा ऊपर से नीचे तक फट गया.सूली पर लटकाये जाने के स्थल पर उपस्थित एक रोमन सैनिक घोषणा की, “सचमुच यह भगवान का बेटा था ” .

सैन्हेद्रिन का एक सदस्य अरिमेठिया का जोसफ यीशू का एक गुप्त शिष्य था, जिसने यीशु को यह दंडादेश देने की सहमति नहीं दी थी, वह पायलट के पास गया और उसने यीशु का शव मांगा यीशु के एक अन्य गुप्त अनुयायी और निकोदेमुस नाम के सैन्हेद्रिन के सदस्य ने एक सौ पौंड वजन का मसाले का मिश्रण लाया और मसीह के शरीर को कपड़े में लपेटने में सहायता की .पायलट ने सूबेदार से कहा कि वह इस बात की पुष्टि कर ले कि यीशु मर चुके हैं. एक सिपाही ने यीशु के शरीर पर भाले से वार किया जिसमें से खून और पानी बाहर निकला और उसके बाद सूबेदार ने पायलट से इस बात की पुष्टि कर दी कि यीशु मर चुके हैं.

क्या है ‘ईस्टर संडे’, और कैसे जिंदा हो गए थे यीशु :

अरिमेठिया के जोसफ ने यीशू के शरीर को एक साफ मखमल के कफन में लपेट कर सूली पर चढ़ाये जाने के पास स्थित एक बगीचे में एक चट्टान को खोद कर बनायी गयी उनकी नयी कब्र में दफना दिया. निकोदेमस भी 75 पाउंड का लोहबान और एक दस्तावर औषधि के साथ पहुंचा था और दफन करने के यहूदी नियमों के अनुसार उसने यीशु के कफन के साथ उन्हें रख दिया . उन्होंने कब्र के प्रवेश द्वार पर एक विशाल पत्थर रखकर उसे बंद कर दिया.उसके बाद वे घर लौटे और विश्राम किया क्योंकि सूर्यास्त के बाद सब्बाथ शुरू हो गया . तीसरे दिन, रविवार को, जो अब ईस्टर रविवारके रूप में जाना जाता है, कहा जाता है कि इस दिन मृत यीशु जी उठे थे।

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