पितृपक्ष विशेष : भटकती आत्माओं का मुक्ति स्थल है गयाधाम

संवाददाता ।

आश्विन मास का कृष्णपक्ष पितरों का उत्सवकाल और पितृपक्ष नाम से हमारे यहां विशेष प्रचलित है. इस काल में लोग अपने पितरों के लिए तर्पण, पार्वण व दान करते हैं. इस बार पितृपक्ष 14 सितंबर से प्रारंभ हो रहा है, जो 28 सितंबर (आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या पंद्रह दिन) तक रहेगा. वैसे तो भारतवर्ष में अनेकों ऐसे पावन स्थल हैं, जहां पिंडदान किया जाता है, परंतु शास्त्रों में इस कार्य के लिए गयाधाम को सर्वोत्तम बताया गया है. गयातीर्थ का माहात्म्य वायु, अग्नि, वराह, कूर्म, गरुड़, भविष्य, वामन, नारद, स्कंद एवं पद्म पुराणों के अतिरिक्त महाभारत में भी वर्णित है. मान्यता है कि गया में पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को पूर्ण शांति और भटकती आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति मिल जाती है।

देश के सामाजिक माहौल में विगत वर्षों में बहुत तेजी से बदलाव आये हैं. पहले वृद्धों की सेवा को पुण्य कार्य समझा जाता था, किंतु आज वृद्धों के प्रति पारंपरिक आदर का भाव लुप्त होता जा रहा है. संवेदनहीनता इस हद तक बढ़ गयी है कि लोग अपने बूढ़े माता-पिता को घर से बाहर निकालने लगे हैं. उन्हें मानसिक यातना देना तो आम बात हो गयी है. ऐसी स्थिति में भी बिहार का गयाधाम अपने पौराणिक महत्व को बरकरार रखे हुए है. आज भी लाखों हिंदू सच्ची और श्रद्धावान पीढ़ी का कर्म निभाते हुए अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति व मुक्ति प्रदान कराने के लिए पहुंचते हैं, जो वर्षों पूर्व उनसे जुदा हो गये थे।


बिहार की राजधानी पटना से लगभग 103 किलोमीटर दूर स्थित बौद्धों की नगरी गया हिंदुओं की मोक्ष-भूमि मानी जाती है. हिंदू धर्म ग्रंथों में ऐसी मान्यता है कि जब तक मृत आत्माओं के नाम पर उनके वंशजों के जरिये पिंडदान और तर्पण नहीं किये जाते, जब तक उन आत्माओं को शांति व मुक्ति नहीं मिलती. आत्मा भटकती रहती है. वेदों के अनुसार, श्राद्ध एवं पिंडदान के लिए प्रसिद्ध ‘गया’ भारत के सप्त प्रमुख पुरियों में भी अपना एक विशेष स्थान रखता है. पुराणों के अनुसार यह हिंदुओं का एक मुक्तिप्रद तीर्थ है. धर्मग्रंथों के मुताबिक पिंडदान और तर्पण कर्म केवल गया में ही विशेष महत्व रखता है. वैसे तो गया में पिंडदान और तर्पण कर्म किसी भी दिन हो सकता है, लेकिन आश्विन, पौष और चैत्र का कृष्णपक्ष सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है. इसमें भी आश्विन कृष्णपक्ष का विशिष्ट महत्व है. शास्त्रों की मान्यता है कि इस अवधि में समस्त पितृ (पितर) यहां आते हैं. यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में गया में पितृ (पितर) शांति करनेवालों की भीड़ अधिकाधिक जुटती है. इस अवधि में पिंडदान करनेवालों की संख्या लगभग दस लाख तक पहुंच जाती है. पिंडदान करनेवालों में नेपाल, श्रीलंका, बर्मा, तिब्बत, भूटान आदि देशों के हिंदू धर्मावलंबियों की संख्या भी अच्छी-खासी रहती है. इसे पितृ पक्ष मेला या पितर पक्ष मेला भी कहते हैं.

वेद-पुराणों में मिलते हैं गयाधाम के उल्लेख:

वाल्मीकि रामायण, महाभारत, गरुड़ पुराण, मत्स्य पुराण, भागवत पुराण, लिंग पुराण, कात्यापन स्मृति आदि में गया में पिंडदान की परंपरा की विशद चर्चा मिलती है. पिंडदान की शुरुआत कब और किसने की, यह बता पाना उतना ही कठिन है, जितना भारतीय धर्म-संस्कृति के उद्भव की कोई तिथि निश्चित करना. हालांकि, स्थानीय पंडों का कहना है कि सर्वप्रथम सतयुग में ब्रह्मा जी ने पिंडदान किया. महाभारत के ‘वन पर्व’ में भीष्म पितामह और पांडवों की गया-यात्रा का उल्लेख मिलता है. इसी तरह, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और युधिष्ठिर के गया आगमन का वर्णन स्पष्ट प्राप्त है. श्रीराम ने महाराजा दशरथ का पिंडदान यहीं (गया) किया था. गया के पंडों के पास साक्ष्यों से स्पष्ट है कि मौर्य और गुप्त राजाओं से लेकर कुमारिल भट्ट, चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस व चैतन्य महाप्रभु जैसे महापुरुषों का भी गया में पिंडदान करने का प्रमाण मिलता है.

मां सीता ने यहीं दिया था फल्गु नदी को श्राप:

गया में फल्गु नदी प्राय: सूखी रहती है. इस संदर्भ में एक कथा प्रचलित है. भगवान राम अपनी पत्नी सीता के साथ पिता दशरथ का श्राद्ध करने गयाधाम पहुंचे थे. श्राद्धकर्म के लिए आवश्यक सामान लाने वे बाजार गये. तब तक राजा दशरथ की आत्मा ने पिंड की मांग कर दी. फल्गु नदी के तट पर अकेली बैठी सीता जी अत्यंत असमंजस में पड़ गयीं. आखिरकार फल्गु नदी, वट वृक्ष और गौ को साक्षी मानकर उन्होंने बालू का पिंड बना कर दे दिया, किंतु भगवान श्रीराम के लौटने पर फल्गु नदी और गौ दोनों मुकर गयीं, पर वटवृक्ष ने सही बात कह दी. इससे क्रोधित होकर सीता जी ने फल्गु नदी को श्राप दिया कि तुम सदा सूखी रहोगी, जबकि गौ को मैला खाने का श्राप दिया. वट वृक्ष पर प्रसन्न होकर सीता जी ने उसे सदा दूसरों को छाया प्रदान करने व लंबी आयु का वरदान दिया. तभी से फल्गु नदी हमेशा सूखी रहती है, जबकि वटवृक्ष अभी भी तीर्थयात्रियों को छाया प्रदान करता है. आज भी फल्गु तट पर स्थित सीता कुंड में बालू का पिंड दान करने की क्रिया (परंपरा) सपन्न होती है.

दो विशिष्ट अंग-जलतर्पण व पिंडदान:

तर्पण और पिंडदान के लिए गया में 55 बेदियां हैं, लेकिन 43 बेदियों का महत्व अधिक है. इनमें भी विष्णुपद, प्रेतशिला, वैतरणी, सीताकुंड और फल्गुधारा सर्वोपरि हैं. ये बेदियां बिखरी हुई हैं, मगर अधिकतर फल्गु नदी के किनारे हैं. इनमें 16 बेदियां एक ही स्थान पर हैं और वे खंभे के रूप में हैं. इन खंभों पर खड़ा एक चौकोर-सा हॉल है. श्रद्धालुगण वहीं बैठ कर पिंडदान करते हैं. जलतर्पण व पिंडदान से पूर्व सिर का मुंडन अनिवार्य है. श्राद्ध की सारी प्रक्रिया गया में रहनेवाले पंडे ही कराते हैं. श्राद्ध कार्य में जलतर्पण व पिंडदान पूजा के दो आवश्यक व विशिष्ट अंग हैं.

वैतरणी में स्नान से पूर्वजों को मिलती है नरक से मुक्ति:

श्राद्ध में प्राय: तीन विधियां अपनायी जाती हैं. एक विधि के अनुसार फल्गु नदी के तट पर विष्णुपद मंदिर में व अक्षय वट के नीचे किया जाता है. दूसरी विधि के अनुसार, 55 बेदियों पर पिंडदान होता है. जबकि, तीसरी विधि के अनुसार, 43 बेदियों पर पिंडदान होता है. वैसे जल तर्पण के लिए फल्गु, गोदावरी, रामसागर व ब्रह्मकुंड सहित कई अन्य तालाब हैं, पर वैतरणी में जल तर्पण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. वैतरणी तालाब के संदर्भ में कहा जाता है कि यही वह भयानक नदी है, जो धरती से स्वर्ग की ओर बहती है और इसमें स्नान मात्र से पूर्वजों को नरक और यातना से मुक्ति मिलती है.

गाय अथवा बछड़ों का दान भी करते हैं श्रद्धालुगण:

आम धारणा है कि पूर्वज इनकी पूंछ के सहारे वैतरणी नदी पार कर लेते हैं. धर्म शास्त्रों के अनुसार हर श्राद्ध के बाद ‘काग बलि’ अनिवार्य है. जल तर्पण करते समय पूर्वजों के नाम पर ईश्वर से प्रार्थना की जाती है. उसके बाद देवों और पूर्वजों के लिए चावल और जौ के आटे व खोवा इत्यादि से पिंडदान किये जाते हैं. सीता कुंड में बालू का पिंडदान दिया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जलतर्पण और पिंडदान से पूर्वजों की आत्मा को पूर्ण शांति व भटकती आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति मिल जाती है।

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