स्वतंत्रता दिवस स्पेशल : स्वतंत्रता संग्राम में चंपारण के सेनानियों का रहा है खास योगदान

 

मोतिहारी । अशोक वर्मा।

आजादी की लडाई मे चंपारण के स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान काफी महत्पूर्ण रहा है।सेनानियों ने न सिर्फ चंपारण मे जोरदार आंदोलन चलाया बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों मे जाकर आंदोलन को गति दी और देश को आजादी दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।
चंपारण मे स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास 1857 से माना जाता है।इसी वर्ष देश मे हुए सिपाही विद्रोह की चिंगारी जिले के सुगौली मे भी गिरी और सुगौली के सिपाहियों ने बगावत कर कई अंग्रेज अफसरों की हत्या कर दी।इस घटना के बाद बौखलाये अंग्रेजों ने अपना क्रूरता भरा दमन तेज कर दिया तथा कई सेनानियों को शहीद किया , कई को जेल मे डाला तथा कईयों को अपंग बनाकर दहशत पैदा कर दी।परिणाम यह हुआ कि लंबे समय तक आंदोलन सिथिल पड गया।


पचास वर्ष के बाद 1910 आते आते पूनः आंदोलनकारी गोलबंद होने लगे और सुलगता आंदोलन मुखर होकर अंग्रेजों के लिए चुनौती बनने लगा।इस बीच गांधी जी के दक्षिण अफ्रिका से लौटने और उनके आंदोलनकारी तेवर की चर्चा देश मे फैल गई थी।जिले के स्वतंत्रता सेनानी प० राजकुमार शुक्ला ने गांधी को चंपारण लाकर उनके नेतृत्व मे सफल आंदोलन चलाया।गांधी के नेतृत्व मे हुए सफल आंदोलन के कारण अंग्रेज कई गलत कानून को वापस लेने को मजबूर हुए।चंपारण सत्याग्रह की सफलता से देश मे चल रहे स्वाधीनता आंदोलन को नयी शक्ति और उर्जा मिली।गांधी जी ने 1942 मे करो या मरो का नारा देकर अंतिम निर्णायक आंदोलन चलाने की हरि झंडी दे दी,परिणाम यह हुआ कि देश आजाद हुआ।


स्वतंत्रता संग्राम मे चंपारण के काफी सेनानियों ने अपने जीवन को देश के लिए उत्सर्ग कर दिया,आहूति दी,जेल गये,मौत को गले लगाया,पढाई छोडी सरकारी आंकडा के अनुसार वर्तमान दोनो चंपारण के स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या 3400 है।
जिले मे अब महज चंद सेनानी हींजीवित बचे है ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत हो चुके हैं।कागज पर विहार सरकार सेनानी के वंशजो मे बेटा, बेटी,पोता,पोती,नाती नतीनी को सेनानी उत्तराधिकारी मानती है।भ्रष्ट व्यवस्था मे आजतक महज सौ उत्तराधिकारियों को पहचान पत्र मिल पाया है।इतनी पेचीदी प्रक्रिया है कि बहुत लोगों ने पहचान पत्र लेने की आस छोड दी।


चंपारण मे एक से बढकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी हुए है,आजादी के 73 वे वर्ष के जश्न के अवसर पर चंद सेनानियों को श्रद्धा शब्द अर्पण…।
मोतिहारी मे महान स्वतंत्रता सेनानी डा० लंबोदर मुखर्जी का जन्म 16 जनवरी 1902 मे हुई थी।चंपारण के इस लाल डा० मुखर्जी आगे चलकर देश के अग्रीम पंक्ति के योद्धा साबित हुए।डा०मुखर्जी पश्चिम बंगाल के उदयपुर मे अपने मामा के यहां पले बढे।वे बचपन से हीं बगावती तेवर के थे।वहां अपने मामा के यहाँ आने जाने वाले क्रांतिकारियों से इनका संपर्क हुआ और आजादी का जजबा हिलोर मारा।संथाल परगना इनके संघर्ष का क्षेत्र बना।वहां कई आंदोलन का नेतृत्व किया।देवघर मे महान क्रांतिकारी चितरंजन दास के क्रांतिकारी भाषण ने मुखर्जी मे नया जोश भरा।संथाल मे तारकेश्व मंदिर आंदोलन, 1927 मे सत्यम सुंदरम आंदोलन,1930-32 के बीच नमक सत्याग्रह एवं संथाल आंदोलन,1937 मे महाजनो के विरूद्ध लाल कुर्ता आंदोलन,ईसाई मिशनरी के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व डा० मुखर्जी ने किया।इस बीच 1938 एवं 1940 मे गिरफ्तार हुए और जेल गये।1935 मे जब संथाल आंदोलन काफी तेजी पर था तब काफी संख्या मे महिला आंदोलनकारियों ने डा० मुखर्जी से संपर्क कर उनसे दिशा ली।इसी क्रम मे महान क्रांतिकारी उषा मुखर्जी आंदोलन मे शामिल होकर महिलाओं मे काफी प्रसिद्ध हो गई।इसी बीच डा० मुखर्जी और उषा मुखर्जी परिणयसूत्र मे बंध गये।दोनो अलग अलग मोर्चे पर आंदोलन का नेतृत्व करने लगे।अंग्रेज इन दोनो से काफी परेशान होने लगे।दमन बढ गया।

1940 मे उषा मुखर्जी गिरफ्तार कर ली गई अपने दो अबोध बच्चो के साथ जेल गई। जेल से छूटने के बाद भारत छोडो आंदोलन मे पूनः गिरफ्तार की गई।तीर धनुष धारी छः सौ महिलाओं के साथ अंग्रेजो पर हमला करने के षडयंत्र का आरोप लगा।1945 मे दोनो के रिहा होने के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने मुखर्जी दमपत्ति को संथाल निकाला घोषित किया।उसके बाद मुखर्जी दमपत्ति मोतिहारी आ गए और डा० लंबोदर मुखर्जी होमियोपैथ की प्रेक्टिस करने लगे।1947 मे डा० मुखर्जी विधायक भी बने थे।प्रेक्टिस के दौरान होमियोपैथ चिकित्सा क़ो सरकारी मान्यता दिलाने के लिए सफल आंदोलन भी चलाया।26-12-1994 को महान सेनानी डा० लंबोदर मुखर्जी ने शरीर छोडा।डा० मुखर्जी के चार पूत्रों मे डा०देवाशीष मुखर्जी, देवव्रत मुखर्जी, देवदत्त मुखर्जी,तथा देवप्रिय मुखर्जी है।छःपूत्रियों मे डा० भारती,स्वाती बनर्जी,जयंती बनर्जी,आरती बनर्जी,अरूंधती बनर्जी,तथा सुप्रिया गांगुली हैं।सभी पूत्र पूत्रियां संसकारी हैं तथा समाजसेवा के प्रति समर्पित हैं।
महान स्वतंत्रता सेनानी डा० लंबोदर मुखर्जी एवं उषा मुखर्जी अपने देश सेवा और गुणो के कारण हमेशा याद किए जायेंगे।

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