अब की बात:हाईटेक जमाने में है लग्जरी वाहनों की चकाचौंध,प्रचार में अब नहीं होती वसंती के धन्नो की पूछ!

कुमार सुबोध सिंह | शंभूगंज/बांका

लोक सभा चुनाव हो या विधान सभा चुनाव हो वर्तमान में हर तरफ पैसे वालो का बोल है । तीन दशक पूर्व मतदाताओ को रिझाने के लिए प्रत्याशी तांगे यानी बसंती की धन्नो की सवारी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था । चुनाव प्रचार बड़ी सादगी के साथ चलता था । प्रचार प्रसार के लिए किस दिशा में कौन निकलेगा इसकी रणनीति बनाई जाती थी । बड़ी पार्टिया के कार्यकर्ता भी साईकिल और तांगे से प्रचार के लिए निकलते थे । उस वक्त माईक नही बल्कि भोपु से लोगो को संम्बोधित किया जाता था । प्रचार पर निकले नेताओ को भोजन करने का विशेष कुछ नही सोचना पड़ता था ।लोग खुद ही आमंत्रित करते और भोजन करवाते थे । लेकिन अब लाग्जरी वाहनो की चकाचौंध व हायटेक प्रचार प्रसार के साधन में तांगे यानी बसंती की धन्नो की टापो की गूंज सड़को पर से गुम हो गई है । प्रत्याशीयो के लिए प्रचार प्रसार करने के लिए तांगे की सवारी अब सपना बनकर रह गया है ।

1980 में कर्पुरी ठाकुर के पार्टी लोकदल से अमरपुर विधान सभा में चुनाव लड़कर महज पांच सौ वोट से नीलमोहन सिंह से पराजित हुए शंभूगंज प्रखंड क्षेत्र के करंजा गांव के गांधी वादी धीरेन्द्र यादव ने बताया कि उस वक्त तांगे की सवारी कर वे प्रचार प्रसार में निकलते थे । मौजुदा समय की भांति जात पात और व्यक्तिगत स्वार्थ की बाते नही होती थी । उन्होने कहा कि लोगो के बीच जाने पर जनसरोकार के मुद्दे उठते थे । उस पर चर्चा होकर समाधान के उपाय तलाशे जाते थे । उस वक्त तांगे की सवारी और भुंजा नास्ता व भोजन के तौर पर सत्तु पीकर कम पैसे में चुनाव लड़ा जाता था । लेकिन वर्तमान समय में हायटेक प्रचार प्रसार के जमाने में पैसा व धन बल चुनाव लड़ने का जरिया बन गया है । जो लोकतंत्र के लिए किसी कलंक के दाग से कम नही है । अब तांगे की सवारी कौन पुछे अब वो दिन भी दुर नही जब प्रत्याशी भी गांव गांव में लाग्जरी वाहन नही बल्कि हेलीराप्टर से सवारी कर वोट मांगेगें ।

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