जानिए,गुरु कैसे खोलते हैं मोक्ष के द्वार!

 

संवाददाता। बंदरा मुजफ्फरपुर ।

प्रखंड क्षेत्र के रामपुरदयाल मे राम जानकी मंदिर समिति द्वारा आयोजित संगीतमय मद्भागवत कथा के पंचम दिवस कथावाचिका निकुंज मंजरी चंचला चैतन्य गौड़ कहा कि गुरु ही मोक्ष के द्वार खोलते हैं। गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धलुओं को बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लेते ही कर्म का चयन किया। नन्हें कृष्ण द्वारा जन्म के छठे दिन ही शकटासुर का वध कर दिया, सातवें दिन पूतना को मौत की नींद सुला दिया। तीन महीने के थे तो कान्हा ने व्योमासुर को मार गिराया। प्रभु ने बाल्यकाल में ही कालिया वध किया और सात वर्ष की आयु में गोवर्धन पर्वत को उठा कर इंद्र के अभिमान को चूर-चूर किया। गोकुल में गोचरण किया तथा गीता का उपदेश देकर हमें कर्मयोग का ज्ञान सिखाया। प्रत्येक व्यक्ति को कर्म के माध्यम से जीवन में अग्रसर रहना चाहिए।


कथावाचिका चंचला जी ने कहा कि मनुष्य जन्म लेकर भी जो व्यक्ति पाप के अधीन होकर इस भागवत रुपी पुण्यदायिनी कथा को श्रवण नहीं करते तो उनका जीवन ही बेकार है और जिन लोगों ने इस कथा को सुनकर अपने जीवन में इसकी शिक्षाएं आत्मसात कर ली हैं तो मानों उन्होंने अपने पिता, माता और पत्नी तीनों के ही कुल का उद्धार कर लिया है। श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने का साधन गौ सेवा है श्रीकृष्ण ने गो को अपना अराध्य मानते हुए पूजा एवं सेवा की। याद रखो, गो सेवक कभी निर्धन नहीं होता।


श्रीमद्भागवत कथा साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन है। यह कथा बड़े भाग्य से सुनने को मिलती है। इसलिए जब भी समय मिले कथा में सुनाए गए प्रसंगों को सुनकर अपने जीवन में आत्मसात करें, इससे मन को शांति भी मिलेगी और कल्याण होगा। कलयुग में केवल कृष्ण का नाम ही आधार है जो भवसागर से पार लगाते हैं। उन्होंने कहा कि परिवर्तन इस संसार का नियम है यह संसार परिवर्तनशील है, जिस प्रकार एक वृक्ष से पुराने पत्ते गिरने पर नए पत्तों का जन्म होता है, इसी प्रकार मनुष्य अपना पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करता है।
श्रीमद्भागवत कथा में व्यास पीठ से चंचला चैतन्य जी ने कहा कि मानव मात्र का कल्याण परमात्मा की शरण में आये बिना सम्भव नही है। प्रभू कथा, मर्यादा व शुद्ध आचरण जीना सिखाती है।


भागवत कथा में कथावाचिका गौड़ ने लोगों को उपदेश देते हुए कहा मानव के कष्ट हरण करने के लिए भगवान ने अनेक लीलाएं कीं, काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार ही शरीर के शत्रु हैं। भक्ति की शक्ति अथवा सत्संग के प्रभाव से इन पर काबू पाया जा सकता है। सत्संग रूपी कथा अमृत जीवन से परिवर्तन आता है । भागवत कथा जीने की कला सिखाता है. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कला सत्संग के प्रभाव से मिलते हैं। यदि व्यक्ति धर्म का आचरण करता है, तो धर्म द्वारा अर्जित अर्थ से धन से अपनी कामनाओं की पूर्ति करता है, तो उसकी सहज मुक्ति होती है, लेकिन अधर्म से कमाए धन से जीव तामसिक वृद्धि होती है. काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार ये तीनों नरक गामी बनाता है। मौके पर अवधेश नारायण ठाकुर, रामचंद्र त्रिवेदी,अनिल कुमार अमर,रविरंजन पाण्डेय,सोनू कुमार,सुरेन्द्र ठाकुर सहित सैकड़ो भक्तजन उपस्थित रहे।

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