एक्सक्लूसिव:इसलिये विख्यात हैं सारण(बिहार) की अम्बिका भवानी!यह है ऐतिहासिक महत्व? देखेंLiveरिपोर्ट!

 

दीपक कुमार तिवारी। सारण(बिहार)।

यूं तो आपने मां वैष्णो देवी,तारापीठ और विन्ध्याचल से जुड़ी मान्यताओं और पौराणिक कथाओं को तो कई बार सुना होगा लेकिन पूर्वोत्तर की धर्मनगरी बिहार के जिस शक्तिपीठ से जुडी मान्यताओं और पौराणिक कथाओं से हम आज आपको रूबरू करा रहे हैं। यह इतिहास के पन्नों पर तो उपलब्ध है लेकिन देश के लोगों की नजरों से आज भी दूर है। बिहार से बाहर रहने वाले और बिहार में निवास करने वाले अधिकाँश लोगों को आज भी इस शक्तिपीठ की महिमा की पुख्ता जानकारी नहीं है। हम बात कर रहे हैं बिहार के सारण जिले में स्थित आमी मंदिर की जिसे अम्बिका भवानी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।


आमी गाँव छपरा जिले से होकर गुजरने वाले NH-19 के किनारे स्थित है। यह गाँव बिहार और उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर स्थित है। एकतरह से यह गाँव बिहार और उत्तरप्रदेश को जोड़ता है। आमी नाम से एक रेलवे स्टेशन भी है और उस रेलवे स्टेशन से थोड़ी दुरी पर स्थित है अम्बिका भवानी मंदिर जिसे आमी मंदिर भी कहा जाता है। अम्बिका भवानी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण द्वापरयुग में महाराज दक्ष प्रजापति के द्वारा करवाया गया था। गंगा नदी के किनारे अवस्थित अम्बिका भवानी मंदिर की बनावट एक किले की तरह है जो चारों तरफ से दीवारों से घिरा हुआ है। यह मंदिर सारण जिले के बाढ़ प्रभावित इलाके में है और गंगा नदी से काफी नजदीक है।

इस मंदिर के पास गंगा अपनी दिशा बदलती है और दक्षिण की तरफ मुड़ जाती है। इस मंदिर के साथ सबसे ख़ास बात यह है कि बाढ़ के दिनों में भी गंगा का पानी मंदिर में प्रवेश नहीं करता है। इस मंदिर की खोज 1973 में बिहार सरकार के पुरातत्व विभाग के निदेशक श्री प्रकाश चन्द्र ने की। खुदाई के दौरान उनको पाल वंश के समय निर्मित ईंट की एक दीवार मिली जिसपर अनुसन्धान के बाद अम्बिका देवी मंदिर के इतिहास के रहस्यों से पर्दा उठा।


वैसे तो अम्बिका भवानी मंदिर से सम्बंधित कई पौराणिक कथाएँ हैं लेकिन राजा दक्ष की कथा आमी मंदिर के महत्त्व को बखूबी रेखांकित करती है। पुराणों में वर्णित है कि राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ समारोह में उन्होंने पुत्री सती और दामाद भगवान शिव को आमंत्रण नहीं भेजा था। भगवान शिव की पत्नी सती ने यज्ञ स्थल पर जाने की जिद की और रक्षकों के साथ यज्ञस्थल पहुंची। यज्ञस्थल पर अपमानित होने के बाद सती ने यज्ञकुंड में खुद को झोंक दिया था। जैसे ही भगवान शिव को सती द्वारा खुद को यज्ञकुंड में झोंकने की सूचना मिली, शिव यज्ञस्थल पहुंचे और उन्होंने सती के मृत देह को कंधे पर उठा तांडव करना शुरू कर दिया।

शिव के तांडव को देख भगवान विष्णु ने अनिष्ट की आशंका यानी शिव के तीसरे नेत्र के खुलने के भय से चक्र द्वारा सती के मृत शरीर के टुकड़े कर दिए। बताया जाता है कि सती के मृत शरीर के टुकड़े भारतवर्ष के कई स्थलों पर गिरे जो आगे चलकर शक्तिपीठ के नाम से विख्यात हुए। आमी स्थित यह पौराणिक मंदिर हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जिस यज्ञस्थल पर सती ने देह त्याग किया था उसकी मिटटी से सती की पिंडी की स्थापना कर शक्ति की पूजा का प्रचलन शुरू हुआ। इस स्थल पर पहुंचकर पूजा-अर्चना कर मांगी मन्नतों के पूरा होने से इस पूजा स्थल की मान्यता स्थापित होती गई और आज अम्बिका भवानी मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र है। कहा जाता है की इस मंदिर में जो भी शुद्ध मन से आता है माँ भवानी उसकी हर मनोकामना पूरी करती है।

अम्बिका भवानी मंदिर से जुड़ी एक अन्य धारणा है जो महाभारत युग से भी पूर्व के काल से जुड़ी है। इस धारणा का सम्बन्ध मार्कंडेय पुराण में वर्णित मेधा मुनि, राजा सुरथ और समाधि वैश्य से है। कहा जाता है कि मेधा मुनि के परामर्श पर सुरथ और समाधि वैश्य ने तीन वर्षों तक भगवती की उपासना की। उपासना से प्रसन्न होकर भगवती ने दर्शन दिया।

ऐसा माना जाता है कि सुरथ और समाधि वैश्य की तपोभूमि का नाम ही आज अम्बिका स्थान है। राजा सुरथ का राजपाट छीन चुका था और समाधि वैश्य को घरवालों ने घर से निकाल दिया था। दोनों भटकते-भटकते सारण्या के जंगल में आये थे जिसे आज सारण के नाम से जाना जाता है। सारण्या से पश्चिम दिशा में आगे बढ़ने पर मेधा मुनि से हुई मुलाकात के बाद दोनों ने अपना दुखड़ा उन्हें सुनाया।

दोनों के दुखड़े को सुनकर मेधा मुनि ने उनका मार्गदर्शन करते हुए कहा कि पूर्व की दिशा में आगे बढ़ो जहाँ गंगा बहती हो वहाँ जाकर गंगा की मिटटी से एक पिंडी रूप, जिसे नौदुर्गा का रूप माना जाता है की स्थापना कर तप करो, तुम्हारी सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। ऐसा माना जाता है कि मिटटी के पिंडी रूप में माँ की प्रतिमा पुरे विश्व में कहीं और नहीं है। मंदिर के पुजारी पंडित प्रेम बाबा की माने तो भूगर्भशास्त्रियों की टीम ने पिंडी के मिटटी की जब जांच की तो पाया की मिटटी 12 हजार साल पुराना है।

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