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वसन्त : नवजीवन, नवचेतना और सौंदर्य का उत्सव

–वसन्त : नवजीवन, नवचेतना और सौंदर्य का उत्सव

आलेख : दीपक कुमार तिवारी

भारतीय मानस में वसन्त केवल ऋतु-परिवर्तन का संकेत नहीं, अपितु जीवन के पुनर्जागरण का दिव्य संदेश है। यह नवयौवन की उच्छलता, चेतना की पुनरुत्थान-शक्ति और अस्तित्व के अविच्छिन्न उल्लास का प्रतीक है। जब शीत के हिमानी निःश्वासों से जर्जरित धरती पर उष्मिल फुहारों का कोमल स्पर्श पड़ता है, तब प्रकृति के कण-कण में नवप्राण का संचार होने लगता है। पतझार की शुष्कता जैसे सहसा पीछे छूट जाती है और हरितिमा का मधुर विस्तार जीवन को पुनः अर्थवान बना देता है।
वसन्त किसी सांत्वना मात्र का शीतल झोंका नहीं, वह तो स्थिर मादकता का परिपूर्ण आविर्भाव है। वायु में घुली अनाम सुगंध, वृक्षों की मंजरियों का स्पंदन, कोयल की पहली कूक और धरती की मुस्कान—ये सब मिलकर एक ऐसी अनुभूति रचते हैं, जिसमें विरक्त हृदय भी अनुराग से भर उठता है। तपोवन का नीरव वातावरण भी रागात्मक हो जाता है। सच ही है, यह वह ऋतु है जो साधु-संयमी संतों की दृष्टि में भी चंचलता भर देती है।
पीताम्बर धारण किए साजन और लज्जावनत घूंघट में सिमटी सजनी का दृश्य केवल प्रणय का संकेत नहीं, बल्कि ऋतु-संक्रमण का सजीव प्रतीक है। धरती की हरितिमा और मानवीय चितवन का यह संवाद वसन्त की ही देन है। इसमें उन्मुक्त हास-परिहास भी है और मर्यादित लज्जा की शालीनता भी। वसन्त शुष्कता का निवारण कर हृदय-प्रदेश में कोमल अनुराग का प्रस्फुटन करता है।


भारतीय सांस्कृतिक चेतना में वसन्त का संबंध केवल प्रकृति से नहीं, अध्यात्म और कला से भी है। शिव का काम-दहन इसी का प्रतीक है—काम का दहन, किंतु कामना का नहीं; देह का भस्मीकरण, किंतु चेतना का आलोकन। यह दमन नहीं, sublimation है—ऊर्ध्वगमन है। भारतीय कला ने इसी भाव को आत्मसात किया है। यहाँ सौंदर्य और संयम, राग और वैराग्य, दहन और दया—सभी एक साथ सहअस्तित्व में हैं।
वसन्त भारतीय कला और साहित्य में अनवरत स्पंदित रहा है। कवियों ने इसे प्रेम का दूत, संगीत का स्वर और जीवन का नवोदय माना है। पल्लव से मंजरी, मंजरी से मधुगंध और मधुगंध से पिकी की पुकार तक सम्पूर्ण विकास-क्रम वसन्त की जीवंतता का द्योतक है। पूर्व का वसन्त केवल प्रतीक्षा नहीं करता, वह स्वयं जीवन के द्वार खटखटाता है।
लोकजीवन में भी इसका स्वरूप उतना ही रंगमय है। होलिका-दहन अन्याय के विरुद्ध अग्नि का प्रतीक है, तो अबीर-गुलाल समानता और उल्लास का। टेसू, कचनार, सेमल और अनार की दाहक लाली त्याग और उत्साह का संदेश देती है, तो बाग-बाग में बहती मधु की धारा प्रेम और माधुर्य का। वसन्त में केसरिया बलिदान भी है और गुलाबी उल्लास भी।
भारतीय दृष्टि में प्रेय और श्रेय अलग नहीं हैं, इसलिए वसन्त केवल मनोरंजन का पर्व नहीं, बल्कि आत्मोन्नयन का अवसर भी है। वह अग्नि भी सुलगाता है और भस्म की रोरी भी लगाता है। वह विविधताओं को मिटाता नहीं, बल्कि उन्हें एक रंग में रंगकर समरसता स्थापित करता है।
अंततः वसन्त उद्गम से उत्कर्ष तक, दहन से दया तक और रंग से रस तक का समन्वित महोत्सव है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे जितना पतझार आए, नवपल्लव की संभावना कभी समाप्त नहीं होती। यही वसन्त का सत्य है—नवजीवन का शाश्वत आश्वासन, आशा का अनश्वर गीत और मानवता का चिरंतन उत्सव।