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भारतीय संदर्भ में युवा और वेलेंटाइन डे : प्रेम, परंपरा और आधुनिकता का संवाद

–भारतीय संदर्भ में युवा और वेलेंटाइन डे : प्रेम, परंपरा और आधुनिकता का संवाद

आलेख : दीपक कुमार तिवारी।

प्रेम मानव जीवन की सबसे स्वाभाविक, सहज और शाश्वत अनुभूति है। यह न भाषा का मोहताज है, न सीमाओं का बंधन स्वीकार करता है। सृष्टि के आरंभ से ही प्रेम जीवन की धुरी रहा है—माँ की ममता, मित्र का स्नेह, गुरु का वात्सल्य और दांपत्य का अनुराग—इन सबके मूल में प्रेम ही स्पंदित होता है। किंतु समय के साथ प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप बदलते रहे हैं। आधुनिक युग में ‘वेलेंटाइन डे’ इसी अभिव्यक्ति का एक लोकप्रिय रूप बनकर उभरा है, विशेषकर युवाओं के बीच।
भारतीय समाज, जो अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों और आध्यात्मिक चेतना के लिए जाना जाता है, वहाँ इस दिवस को लेकर अक्सर बहस होती रही है—क्या यह विदेशी संस्कृति का अंधानुकरण है या प्रेम की सार्वभौमिक भावना का उत्सव? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें भारतीय दृष्टि, युवा मनोविज्ञान और बदलते सामाजिक परिवेश—तीनों को समझना होगा।
भारत अर्थात् भारत की संस्कृति में प्रेम कोई आयातित भावना नहीं है। यहाँ तो प्रेम को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग माना गया है। राधा-कृष्ण की लीलाएँ हों, राम-सीता का आदर्श दांपत्य हो, शिव-पार्वती का तपोमय प्रेम हो या मीरा की भक्ति—भारतीय परंपरा प्रेम की अनगिनत व्याख्याओं से समृद्ध रही है। यहाँ प्रेम केवल देह का आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा का मिलन है। वह समर्पण है, त्याग है, मर्यादा है।
यदि इतिहास की ओर देखें तो वसंतोत्सव, मदनोत्सव, फाग, बसंत पंचमी और होली जैसे पर्वों में प्रेम और उल्लास की खुली अभिव्यक्ति मिलती है। युवक-युवतियाँ गीत गाते, रंग खेलते और मन के भाव प्रकट करते थे। अर्थात प्रेम का उत्सव मनाना भारतीय जीवन का स्वाभाविक हिस्सा रहा है। ऐसे में यह कहना कि प्रेम-दिवस मनाना हमारी संस्कृति के विरुद्ध है, पूर्णतः सत्य नहीं प्रतीत होता।
हाँ, यह अवश्य है कि ‘वेलेंटाइन डे’ का स्वरूप पश्चिमी परंपरा से आया है, जहाँ इसे एक विशेष दिन के रूप में मनाया जाता है। उपहार, गुलाब, कार्ड, संदेश और साथ समय बिताने की परंपरा ने इसे व्यावसायिक रंग भी दे दिया है। भारतीय समाज में जब यह संस्कृति आई तो युवाओं ने इसे तेजी से अपनाया, क्योंकि यह उन्हें अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का सहज अवसर देता है।


युवा मन स्वभावतः संवेदनशील और अभिव्यक्तिशील होता है। वह अपने संबंधों को शब्द देना चाहता है, अपने स्नेह को प्रकट करना चाहता है। पहले जहाँ सामाजिक संकोच और पारंपरिक मर्यादाएँ खुली अभिव्यक्ति में बाधक थीं, वहीं आज शिक्षा, तकनीक और सोशल मीडिया ने संवाद के नए द्वार खोल दिए हैं। ऐसे में वेलेंटाइन डे युवाओं के लिए प्रेम, मित्रता और अपनत्व को व्यक्त करने का माध्यम बन गया है।
लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब प्रेम की गहराई के स्थान पर उसका सतही और भौतिक पक्ष हावी हो जाता है। बाजारवाद ने इस दिवस को ‘उपहार संस्कृति’ में बदल दिया है। महंगे गिफ्ट, ब्रांडेड वस्तुएँ, दिखावटी समारोह—इन सबने प्रेम की सहजता को कहीं न कहीं कृत्रिम बना दिया है। परिणामस्वरूप संबंधों में प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ने लगी है।
भारतीय दृष्टि हमें सिखाती है कि प्रेम प्रदर्शन नहीं, अनुभूति है; अधिकार नहीं, समर्पण है; आकर्षण नहीं, विश्वास है। यदि वेलेंटाइन डे केवल फोटो खिंचवाने, सोशल मीडिया पोस्ट डालने और दिखावे तक सीमित रह जाए, तो वह प्रेम की आत्मा से दूर हो जाता है। वहीं यदि इसे संवेदना, सम्मान और जिम्मेदारी के साथ मनाया जाए, तो यह संबंधों को सुदृढ़ करने का सुंदर अवसर बन सकता है।
युवाओं के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती संतुलन की है—परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन। एक ओर वे वैश्विक संस्कृति से जुड़े हैं, दूसरी ओर अपनी जड़ों से भी कटना नहीं चाहते। ऐसे में आवश्यक है कि वे किसी भी परंपरा को आँख मूँदकर न अपनाएँ, बल्कि उसके सार को समझें।
यदि वेलेंटाइन डे को केवल प्रेमी-प्रेमिका तक सीमित न रखकर व्यापक अर्थों में देखा जाए—माता-पिता के प्रति कृतज्ञता, मित्रों के प्रति स्नेह, शिक्षकों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति करुणा—तो यह दिवस अधिक सार्थक हो सकता है। प्रेम का दायरा जितना विस्तृत होगा, समाज उतना ही मानवीय बनेगा।
भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देती है—संपूर्ण विश्व एक परिवार है। इस दृष्टि से प्रेम किसी एक संबंध का नहीं, बल्कि समग्र जीवन का उत्सव है। यदि युवा इस मूल भावना को आत्मसात कर लें, तो वेलेंटाइन डे भी भारतीय संवेदना का अंग बन सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रेम को केवल रोमांटिक भावना तक सीमित न करें। प्रेम में सम्मान हो, सहमति हो, मर्यादा हो और जिम्मेदारी हो। संबंधों में विश्वास और समझ हो। तभी प्रेम स्थायी बनता है। अन्यथा वह क्षणिक आकर्षण बनकर रह जाता है।
शिक्षण संस्थानों, परिवारों और समाज को भी चाहिए कि वे युवाओं को प्रेम के स्वस्थ और सकारात्मक आयामों से परिचित कराएँ। प्रतिबंध और विरोध के स्थान पर संवाद और समझ की आवश्यकता है। जब हम युवाओं की भावनाओं को समझेंगे, तभी वे हमारी परंपराओं का सम्मान करेंगे।
अंततः कहा जा सकता है कि वेलेंटाइन डे न तो पूर्णतः अस्वीकार्य है, न ही अंधानुकरण योग्य। यह एक अवसर है—प्रेम को समझने का, उसे सहेजने का और उसे मानवीय मूल्यों से जोड़ने का। भारतीय संदर्भ में इसका सही अर्थ तभी है, जब यह प्रेम को उच्छृंखलता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता दे; दिखावा नहीं, बल्कि आत्मीयता दे; क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि स्थायी विश्वास दे।
प्रेम यदि पवित्र है, तो उसका उत्सव भी पवित्र होना चाहिए।
और जब युवा प्रेम को मर्यादा और मूल्य के साथ अपनाएँगे, तभी सच्चे अर्थों में हर दिन वेलेंटाइन डे बन सकेगा—मानवता के प्रेम का, संबंधों की ऊष्मा का और जीवन के सौंदर्य का।