–बेनीबाद में बागमती तटबंध के खिलाफ अनशन का दूसरा दिन, अधिकारियों से वार्ता बेनतीजा
मजदूर–किसानों को उजाड़ने वाली योजना पर रोक की मांग तेज, आंदोलन तेज करने की चेतावनी
दीपक कुमार, गायघाट(मुज़फ्फरपुर), 17 फरवरी 2026।
चास-वास जीवन बचाओ बागमती संघर्ष मोर्चा के तत्वावधान में विनाशकारी बागमती तटबंध परियोजना को रोकने की मांग को लेकर चल रहे सामूहिक अनशन और सत्याग्रह का दूसरा दिन बड़ी भागीदारी वाली सभा के साथ संपन्न हुआ। आंदोलनकारियों ने साफ कहा कि जब तक परियोजना की निष्पक्ष समीक्षा की प्रशासनिक गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक अनशन जारी रहेगा।
सभा को संबोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी–लेनिनवादी) लिबरेशन के पोलित ब्यूरो सदस्य धीरेंद्र झा ने कहा कि बागमती एक नदी नहीं, बल्कि नदियों का समूह है। 1960 के दशक में शुरू हुई बागमती परियोजना के परिणाम नकारात्मक रहे हैं, इसलिए किसी भी नई योजना या विस्तार से पहले समग्र अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन के दबाव में बनी रिव्यू कमिटी को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है। बिना रिपोर्ट के काम आगे बढ़ाना गैरकानूनी है।

बागमती आंदोलन के नेता जितेंद्र यादव ने कहा कि सरकार ने जनविरोधी तरीके से रिव्यू कमिटी को निष्क्रिय कर दिया है। जनता की आवाज को फिर से सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया जाएगा और जरूरत पड़ी तो पूरे बागमती क्षेत्र में पदयात्राएं आयोजित की जाएंगी।
पूर्व विधायक मनोज मंजिल ने आंदोलनकारियों का समर्थन करते हुए कहा कि “आपने नदी और जीवन बचाने का उल्लेखनीय संघर्ष खड़ा किया है। तबाही की इस योजना को किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने दिया जाएगा।”
अनशन के दूसरे दिन जिला प्रशासन की ओर से डीसीएलआर पूर्वी वार्ता के लिए पहुंचे, लेकिन आंदोलनकारी रिव्यू कमिटी से परियोजना की समीक्षा और स्पष्ट गारंटी की मांग पर अड़े रहे। वार्ता बेनतीजा रही और अनशन जारी रखने की घोषणा की गई।
सभा की अध्यक्षता ठाकुर देवेंद्र कुमार ने की तथा संचालन जितेंद्र यादव ने किया। मौके पर राज किशोर राय, राम इकबाल राय, राजा हुसैन, मुजाहिद हुसैन, मिथिलेश राय, जगन्नाथ पासवान, राहुल कुमार यादव, उपेंद्र प्रसाद सिंह, हुकुमदेव राय, मुकेश शर्मा, चंद्रशेखर राय, प्रमोद कुमार सिंह, राजेंद्र राय, सुनील राय, बैजनाथ यादव सहित कई ग्रामीण और कार्यकर्ता मौजूद रहे।
आंदोलनकारियों का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ तटबंध के खिलाफ नहीं, बल्कि मजदूरों–किसानों के घर, खेत और जीवन बचाने की लड़ाई है, जिसे हर हाल में जारी रखा जाएगा।












