-बिहार में कांग्रेस का बड़ा दांव: महागठबंधन से दूरी, ‘एकला चलो’ की राह पर पार्टी
पटना। बिहार की राजनीति में कांग्रेस ने बड़ा राजनीतिक मोड़ ले लिया है। विधानसभा चुनावों में लगातार घटती प्रभावशीलता, कमजोर होता जनाधार और गठबंधन राजनीति में पिछलग्गू बनने की छवि से परेशान कांग्रेस अब राज्य में ‘एकला चलो’ की राह पर आगे बढ़ने का निर्णय ले चुकी है। दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठकों में—जहाँ राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित शीर्ष नेतृत्व मौजूद था—इस रणनीति को अंतिम मंजूरी दे दी गई।
तीन दिनों तक चली बैठकों में प्रदेश के नेताओं ने बिना लाग–लपेट पार्टी की जमीन हकीकत सामने रखी। उनका कहना था कि महागठबंधन में रहने से पार्टी के पारंपरिक वोटरों में भारी क्षरण हुआ है। संगठन कई क्षेत्रों में लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुँच चुका है। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम, प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और पूर्व विधायक दल नेता शकील अहमद खान ने भी यह स्वीकार किया कि राजद-प्रभावित इलाकों में कांग्रेस की स्वतंत्र पहचान लगभग मिट चुकी है। 2010 में अकेले लड़कर 4 सीटें जीतने वाली कांग्रेस, सात दलों के महागठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद सिर्फ 6 सीटों पर ही सिमट गई—यह खुद बहुत कुछ कहता है।
इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने अब नए सिरे से बिहार में संगठन को मजबूती देने और स्वतंत्र रूप से चुनावी जमीन तैयार करने का फैसला लिया है। इसकी शुरुआत 14 दिसंबर को दिल्ली में होने वाली ‘वोट चोरी के खिलाफ’ रैली से होगी। रैली को सफल बनाने और संगठन के पुनर्गठन के लिए एक दिसंबर को पटना स्थित सदाकत आश्रम में सभी जिलाध्यक्षों एवं फ्रंटल संगठनों की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है।

कांग्रेस की अगली रणनीति जिला और प्रखंड स्तर तक दौरों की है। शीर्ष नेता पूरे राज्य में जाकर कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात करेंगे, पराजय के बाद कमजोर पड़े मनोबल को फिर मजबूत करेंगे और बूथ स्तर तक नई टीम खड़ी करने की तैयारी शुरू करेंगे। पार्टी अब उन क्षेत्रों में भी सक्रिय अभियान चलाने की योजना बना रही है, जहाँ वह राजद के मजबूत प्रभाव के कारण अब तक पूरी ताकत से नहीं उतर पाती थी।
कांग्रेस नेतृत्व की राय साफ है—अगर पार्टी को बिहार में फिर से अपना वजूद मजबूत करना है, तो स्वतंत्र और आक्रामक राजनीतिक उपस्थिति ही एकमात्र रास्ता है। अभी राज्य में कोई बड़ा चुनाव नहीं है, ऐसे समय का उपयोग कर संगठन को पुनर्जीवित करने की रणनीति पार्टी ने बनाई है।
नए नारे, नई दिशा और नए उत्साह के साथ कांग्रेस बिहार में अपनी ‘एकला चलो’ यात्रा शुरू करने जा रही है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह राजनीतिक जोखिम पार्टी को नई ऊर्जा देता है या चुनौती और बढ़ाता है।








