–बिहार की राजनीति में ‘ब्राह्मणवाद’ बहस: 35 साल के यादव–कुर्मी वर्चस्व के बाद भी ब्राह्मण क्यों निशाने पर?
आलेख: दीपक कुमार तिवारी।
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द को लेकर छिड़ी बहस ने एक बार फिर सामाजिक ताने-बाने और सत्ता की हिस्सेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विवाद किसी एक जाति के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक नैरेटिव, प्रतिनिधित्व की मांग और सामाजिक ध्रुवीकरण की रणनीति से जुड़ा है।
पिछले करीब 35 वर्षों से राज्य की सत्ता का केंद्र मोटे तौर पर यादव–कुर्मी नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। कभी लालू प्रसाद यादव की राजनीति तो कभी नीतीश कुमार का सुशासन मॉडल—इन दो ध्रुवों ने ही सत्ता की दिशा तय की। ऐसे में सवाल उठता है कि जब निर्णायक सत्ता इन्हीं सामाजिक समूहों के पास रही, तब महज 3-4 प्रतिशत आबादी वाले ब्राह्मण समाज को बार-बार राजनीतिक निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
20 फरवरी को विधानसभा में संदीप सौरभ (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले)) ने यूजीसी इक्विटी एक्ट से जुड़े प्रश्न के दौरान ‘ब्राह्मणवादी मानसिकता’ शब्द का इस्तेमाल किया। इसके बाद सदन का माहौल गरमा गया।
भारतीय जनता पार्टी के विधायक मिथिलेश तिवारी ने कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह किसी समाज विशेष को बदनाम करने की कोशिश है। उन्होंने धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ देते हुए ब्राह्मणों की परंपरागत भूमिका का उल्लेख किया और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना तक का उदाहरण दिया।
उधर, डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने भी आपत्ति जताई। विवाद बढ़ता देख विधानसभा अध्यक्ष ने ‘ब्राह्मण’ शब्द को कार्यवाही से हटाने का निर्देश दिया। बाद में राष्ट्रीय जनता दल के विधायक आलोक मेहता ने सफाई दी कि ‘ब्राह्मणवाद’ कोई जाति नहीं बल्कि एक सोच का प्रतीक शब्द है।
‘ब्राह्मणवाद’ बनाम ‘ब्राह्मण’: शब्दों का राजनीतिक खेल:
यही वह बिंदु है जहां राजनीति ज्यादा और समाज कम दिखाई देता है। ‘ब्राह्मणवाद’ को कई वामपंथी और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दल ‘सामंती या वर्चस्ववादी मानसिकता’ के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन आम जनमानस में यह शब्द सीधे ब्राह्मण समाज से जोड़कर देखा जाता है। नतीजा—राजनीतिक बयानबाजी सामाजिक तनाव में बदल जाती है।
यानी, वैचारिक आलोचना और जातीय आरोप के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

सत्ता किसके पास, निशाना कौन?
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो बीते तीन दशकों में मुख्यमंत्री पद, संगठनात्मक नेतृत्व और प्रशासनिक नियंत्रण मुख्यतः यादव और कुर्मी नेतृत्व के पास रहा है। इसके बावजूद ब्राह्मणों को ‘सत्ता का प्रतीक’ बताकर निशाना बनाना कई सवाल पैदा करता है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि:
यह असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की रणनीति हो सकती है।
जातीय ध्रुवीकरण कर अपने कोर वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास
‘विरोधी चेहरा’ बनाकर राजनीतिक गोलबंदी
यानी, एक छोटी आबादी को प्रतीक बनाकर बड़ा नैरेटिव गढ़ना।
सामाजिक न्याय या राजनीतिक सुविधा?
बिहार की राजनीति सामाजिक न्याय के नाम पर आगे बढ़ी, लेकिन अब वही राजनीति कई बार नए विभाजन भी पैदा करती दिखती है। पिछड़ों–अतिपिछड़ों–दलितों–अल्पसंख्यकों की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है, लेकिन किसी एक समाज को लगातार दोषी ठहराना सामाजिक सौहार्द के लिए ठीक नहीं।
विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रतिनिधित्व की लड़ाई को सामाजिक दुश्मनी में बदलना लोकतंत्र को कमजोर करता है।
आगे का रास्ता
बिहार जैसे बहुजातीय समाज में राजनीतिक भाषा जिम्मेदार होनी चाहिए। ‘वाद’ और ‘जाति’ के फर्क को समझे बिना दिए गए बयान न सिर्फ विवाद बढ़ाते हैं बल्कि समाज में अविश्वास भी पैदा करते हैं।
आज जरूरत है जातीय टकराव की जगह समावेशी राजनीति
वास्तविक मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य—पर बहस
प्रतिनिधित्व की मांग को संवाद के जरिए हल करने की।
निष्कर्षतः ‘ब्राह्मणवाद’ पर उठी बहस सिर्फ एक शब्द का विवाद नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि बिहार की राजनीति अभी भी जातीय पहचान के चक्रव्यूह में फंसी है। सवाल यह है कि नेता सत्ता न मिलने की हताशा निकाल रहे हैं या लोकप्रियता के लिए समाज को बांट रहे हैं?
अगर राजनीति सच में विकास की ओर बढ़ना चाहती है, तो जातीय आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता को प्राथमिकता देनी होगी—वरना यह बहस सिर्फ वोटों का गणित बनकर रह जाएगी।
















