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थर्मल इमेजिंग सिस्टम से 300 मीटर पहले ही मिलेगी हाथियों की सूचना, एनईआर में भी लागू होगी नई तकनीक

-थर्मल इमेजिंग सिस्टम से 300 मीटर पहले ही मिलेगी हाथियों की सूचना, एनईआर में भी लागू होगी नई तकनीक

गोरखपुर, मुख्य संवाददाता।
रेल ट्रैक पर हाथियों और बाघों की जान बचाने के लिए अब अत्याधुनिक थर्मल इमेजिंग तकनीक का सहारा लिया जाएगा। दक्षिण भारत में सफल प्रयोग के बाद इस सिस्टम को अब North Eastern Railway (एनईआर) में भी लागू करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। बीते सप्ताह गोरखपुर मुख्यालय में तकनीकी एजेंसी ने अफसरों को इसका विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया।
एजेंसी का दावा है कि थर्मल इमेजिंग सर्विलांस (ई-आई) सिस्टम पहले से उपयोग में लाई जा रही तकनीकों की तुलना में अधिक सटीक और प्रभावी है। हर साल रेल ट्रैक पर ट्रेन की चपेट में आने से हाथियों की मौत की घटनाएं सामने आती हैं, जिन्हें इस नई व्यवस्था से काफी हद तक रोका जा सकेगा।

रात में भी सटीक निगरानी:

थर्मल कैमरे अंधेरे या घने जंगल में भी जानवरों की लोकेशन और उनके मूवमेंट की सटीक पहचान कर लेते हैं, जो सामान्य कैमरों से संभव नहीं है। जैसे ही कोई हाथी या बड़ा वन्यजीव ट्रैक के करीब आता है, सिस्टम तुरंत सक्रिय होकर कंट्रोल रूम को अलर्ट भेज देता है।

300 मीटर पहले मिलेगा अलर्ट:

Indian Railways के अनुसार ट्रैक किनारे लगाए गए ऊंचे टावरों पर थर्मल व सामान्य कैमरे लगाए जाएंगे। जैसे ही कोई हाथी करीब 300 मीटर के रेड जोन में पहुंचेगा, सिस्टम तुरंत सूचना देगा। अलर्ट मिलते ही ट्रेन की रफ्तार कम कर दी जाएगी और जरूरत पड़ने पर ट्रेन को रोक भी दिया जाएगा।
पहले से चल रहे उपाय
वर्तमान में रेलवे ‘हनी बी बजर’ (मधुमक्खी की आवाज) और ‘डिस्ट्रीब्यूटेड एकॉस्टिक सेंसर’ जैसी तकनीकों का उपयोग कर रही है, जिससे हाथियों को ट्रैक से दूर भगाने की कोशिश की जाती है। हालांकि, इन उपायों के परिणाम बहुत प्रभावी नहीं रहे हैं।

तमिलनाडु में सफल प्रयोग:

तमिलनाडु के घने वन क्षेत्रों में यह सिस्टम पहले ही लगाया जा चुका है, जहां बेहतर परिणाम मिले हैं। एजेंसी के रविकांत सिंह ने बताया कि साउथ रेलवे के एक वन क्षेत्र में ट्रैक पर मौजूद 10 हाथियों की लोकेशन सिस्टम ने 592 मीटर पहले ही पकड़ ली, जिससे ट्रेन चालक समय रहते गति कम कर सका।
अब एनईआर के जंगल क्षेत्रों से गुजरने वाले रेल ट्रैक पर भी इस तकनीक को स्थापित करने की तैयारी चल रही है, जिससे वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
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