-ग्रामीण अंचलों में छाया फागुन का रंग, डम्फा-झाल की थाप पर देर रात तक गूंज रहे पारंपरिक होली गीत
मुजफ्फरपुर/बन्दरा।दीपक तिवारी।
मुजफ्फरपुर जिले में होली का रंग अब शहर से निकलकर गांवों की चौपालों तक पूरी तरह चढ़ चुका है। खासकर बन्दरा प्रखंड सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में फागुन की मस्ती देखते ही बन रही है। शाम ढलते ही गांव-कस्बों में डम्फा, झाल और ढोलक की थाप गूंजने लगती है और लोग पारंपरिक फाग एवं होली गीतों पर झूम उठते हैं।
ग्रामीण संस्कृति की यह अनोखी छटा आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है। जहां शहरों में डीजे और आधुनिक गानों का शोर सुनाई देता है, वहीं गांवों में आज भी लोकगीतों की मिठास और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनें माहौल को खास बना रही हैं। बुजुर्ग, युवा और बच्चे सभी टोली बनाकर चौपाल, मंदिर प्रांगण और गलियों में इकट्ठा होकर ‘फाग’ गाते नजर आ रहे हैं।

बन्दरा के अलावा गायघाट, मुरौल, कटरा, औराई, मीनापुर और बोचहां प्रखंडों के कई गांवों में शाम से लेकर देर रात तक होली गीतों की महफिल सज रही है। महिलाएं पारंपरिक परिधानों में समूह बनाकर गीत गा रही हैं, तो युवक ढोल-झाल की थाप पर नाचते हुए माहौल को और रंगीन बना रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और होली का असली आनंद इसी लोक संस्कृति में है। गांवों में आपसी भाईचारा, हंसी-मजाक और गीत-संगीत के बीच लोग पुरानी रंजिशें भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं।
फागुन की मस्ती में डूबे इन गांवों का नजारा यह साबित करता है कि आधुनिकता के दौर में भी पारंपरिक लोक संस्कृति जीवित है और लोगों के दिलों में बसी हुई है। सच मायनों में गांवों की होली ही असली रंग और उमंग का एहसास कराती है।
आप भी इन लोकगीतों की मधुरता और गांवों की होली का आनंद उठाइए, जहां हर थाप में संस्कृति और हर गीत में अपनापन झलकता है।













