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आलेख : सितम्बर का उल्लास

आलेख : सितम्बर का उल्लास

✍🏻 दीपक कुमार तिवारी

खेतों में धान की फूटती दुधमुंही गंध जैसे दूर से ही संदेश देती है कि सितम्बर आ पहुँचा है। सावन में नैहर आयी नदियाँ अब अपना आँचल समेटने लगी हैं, ताल का जल स्थिर होकर मानो ध्यानमग्न हो गया है। इस मौसम की साँझ पहले से अधिक मोहक हो उठी है। ललछिमहे बादल दिशाओं के आगे ऐसे झुकते हैं, जैसे प्यासा पनिहारिन के सामने अंजुरी भर जल को होंठों से लगाने को झुक गया हो।

पोखर की तली में उठते सिंदूरी बुलबुले सूरज के चंचल स्पर्श से ऐसे लगते हैं मानो जल ने रंगों को प्रेम में रूपांतरित कर लिया हो। लगता है मानो ताल ने बादलों को कसकर गले लगा लिया हो। बाजरे, तिल, पटसन और ऊख से सजे खेतों को देखकर करेजा ठंडा हो जाता है। बँसवारी के पार डूबता सूरज धीरे-धीरे गाँव को सोने में स्नान कराता है।

पकती हरियाली के बीच ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती ने बंदनवार सजा दिया हो। रसोई से उठती पकवानों की महक, घृत-होम की संध्या और मक्के के खेतों की सुनहली होती बालियाँ त्योहारों की आहट सुनाती हैं। रातरानी और हरसिंगार की खुशबू जैसे हृदय को भी मदिर कर देती है। प्रकृति की यह समृद्धि हर ओर जीवन को रंगों से भर देती है।

क्षितिज पार से खंजन के आगमन का संदेश भी यही कहता है कि मिलन सदा मधुर होता है। बरखा और शरद के संधिकाल में खड़ा सितम्बर उल्लास और सौंदर्य का अनूठा दूत है। इसे महसूस कीजिए, इसे हृदय के हर बिंदु पर संजो लीजिए, क्योंकि यही ऋतु जीवन के उत्सव का आरंभ करती है।