-बिहार के सियासत मे मुसलमानो की भूमिका ?
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एम .रहमान । पटना।
बिहार में मुस्लिम वोटरों की अच्छी खासी तादाद है। राज्य में कई लोकसभा सीटों पर अल्पसंख्यक वोटर निर्णायक भूमिका में होते हैं। उनके वोट के आधार पर ही उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होता है। ऐसे में सभी राजनीतिक पार्टियां या गठबंधन मुस्लिम वोट के समर्थन के लिए दिन रात एक करती हैं।बिहार में हाल में सियासी तौर पर काफी उलट-फेर हुआ है । भाजपा व जदयू उलटफेर कर फिर से सत्ता में आ गई है और जब भी राजद की बात होती है तो उसके साथ माई समीकरण का भी जिक्र जरूर छिड़ता है। माई यानी मुस्लिम और यादव.
असल में, जब बात सियासत में जातीय समीकरण की हो, और बिहार का जिक्र न हो ऐसा कभी होती नहीं । बिहार की सियासत में जातीय समीकरण का योगदान बहुत ही बड़ा है.सभी दल सोशल इंजीनियरिंग को जरिया बनाकर जातीय समीकरण साधते हैं और लालू यादव ने ऐसे ही मुस्लिम यादव समीकरण को एक हथियार बना कर प्रदेश की कमान संभाली और 15 साल तक सत्ता पर काबिज रहे।बिहार में तकरीबन सभी दल मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते दिखते हैं, लेकिन यह बात बहुत हैरान करने वाली है कि आज़ादी के बाद से लेकर अभी तक एक मात्र मुस्लिम, जो बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे अब्दुल गफूर खान. और वो भी बस दो साल तक उस गद्दी पर बैठ सके ।

मुस्लिम वोट बिहार की राजनीति में सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने में काफी निर्णायक साबित होता है. बिहार की कुल आबादी में मुसलमानों की तादाद तक़रीबन 17 फीसदी हैं. इसलिए मुसलमानों का वोट पाने की जुगत में सारे राजनीतिक दल रहते हैं। मुस्लिम समुदाय आज़ादी के बाद से परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ रहा और 70 के दशक में सूबे को मुस्लिम मुख्यमंत्री के रूप में अब्दुल गफूर खान मिले ।अब्दुल गफूर का जन्म बिहार के गोपालगंज जिले में 18 मार्च, 1918 में हुआ था । वह बचपन से ही बहुत मेधावी छात्र थे और देश के लिए कुछ करना चाहते थे. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गोपालगंज में ही हुई , उन्होंने आगे की पढाई के लिए अपना दाखिला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लिया और यही से इनकी सयासी सफर की शुरुआत हुई।देश में उसी समय स्वतंत्रता संग्राम चरम पर था और अब्दुल गफूर खान भी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. कहते हैं इस दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा ।1952में अब्दुल गफूर खान पहली बार बिहार विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने. तब आज़ादी के बाद से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लगातार कांग्रेस का कब्ज़ा था । अब्दुल गफूर खान ने बिहार के 15वें मुख्यमंत्री के रूप में जुलाई, 1973 में कुर्सी पर बैठे. लेकिन वह उस कुर्सी पर बहुत समय तक नहीं रह सके ।अब्दुल गफूर 2 जुलाई, 1973से 11अप्रैल, 1975तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे । राजनैतिक पंडितों का मानना है कि अब्दुल गफूर को कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी का शिकार होकर अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी ।गौरतलब है कि जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में मार्च, 1974में बिहार से छात्र आंदोलन की शुरुआत हुई थी । उस समय बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर ही थे। इस आंदोलन ने बहुत ही कम समय में पूरे देश में अपनी पकड़ बना ली। 18 मार्च 1974को पटना में छात्रों और युवकों द्वारा आंदोलन शुरू किया गया था. उसी दिन से विधानमंडल सत्र की शुरुआत होने वाली थी और दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को राज्यपाल संबोधित करने वाले थे।उधर पटना के आंदोलनकारी छात्रों ने योजना बनाई कि वे राज्यपाल को विधानसभा जाने से रोकेंगे और उनका घेराव करेंगे। इस योजना का पता लगने के कारण सत्ताधारी विधायक सुबह 6 बजे ही विधानसभा आ गए. वहीं विपक्षी विधायकों ने राज्यपाल के अभिभाषण के बहिष्कार का निर्णय कर लिया, इसलिए वे वहां गए ही नहीं ।छात्रों ने राज्यपाल की गाड़ी को रास्ते में रोक लिया. जब पुलिस प्रशासन द्वारा छात्रों को रोका गया तब छात्र बहुत ही उग्र हो गए. पुलिस द्वारा छात्रों पर लाठीचार्ज कर दिया. इस घटना में बहुत सारे छात्र जख्मी हो गए. भीड़ बेकाबू हो गई और आंसू गैस के गोले छोड़े गए. लूटपाट और आगजनी होने लगी ।इस घटना में कुछ छात्रों को अपनी जान गवानी पड़ी।जयप्रकाश नारायण (जेपी) से आंदोलन की कमान संभालने को कहा गया. जेपी ने शर्त रखी कि आंदोलन में कोई भी व्यक्ति किसी पार्टी से जुड़ा नहीं होना चाहिए. लोगों ने उनकी मांग मांग ली और राजनीतिक पार्टियों से जुड़े छात्र इस्तीफा देकर जेपी के साथ चले गए. इसमें कांग्रेस के भी कई छात्र शामलि थे ।कहा जाता है कि अब्दुल गफूर खान के खिलाफ उनकी ही पार्टी के नेताओं ने साजिश रची और उन्हें कुर्सी गंवानी पड़ी ।केदार पांडे और जगन्नाथ मिश्रा उनके समकालीन नेता थे । इन लोगों के बीच कुर्सी की खींचतान चलती रही लेकिन अब्दुल गफूर खान के मुख्यमंत्री रहते बिहार में कई अहम घटनाएं हुईं।जेपी आंदोलन के कारण उन पर इस्तीफे का दबाव बना और उनके ही शासन काल में1975में बिहार के समस्तीपुर में ललित नारायण मिश्रा की हत्या । ये दोनों घटनाएं गफूर के खिलाफ गईं और उस समय की कांग्रेस की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975में अब्दुल गफूर को हटाकर उनकी जगह जगन्नाथ मिश्र को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया ।नीतीश कुमार ने जब राजद से अलग होकर समता पार्टी बनाई तो पार्टी के गठन में अब्दुल गफूर ने सक्रिय भूमिका निभाई। वह समता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे । 10 जुलाई, 2004को लंबी बीमारी के बाद पटना में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया ।
सर्वाधिक मुस्लिम वोटर वाला क्षेत्र किशनगंज
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राज्य की मुस्लिम आबादी 16.9 फीसदी के करीब है। 13 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मुसलमान मतदाताओं की संख्या 12 से 67 फीसदी के बीच है। बिहार में सर्वाधिक मुस्लिम वोटर वाला लोकसभा क्षेत्र किशनगंज है, यहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 67 फीसदी है, वहीं दूसरे स्थान पर कटिहार है, जहां मुस्लिम वोटर की संख्या 38 फीसदी, अररिया में 32 फीसदी, पूर्णिया में 30 फीसदी, मधुबनी में 24 फीसदी, दरभंगा में 22 फीसदी, सीतामढ़ी में 21 फीसदी, पश्चिमी चंपारण 21 फीसदी और पूर्वी चंपारण 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। सीवान, शिवहर खगडिय़ा, भागलपुर, सुपौल, मधेपुरा, औरंगाबाद, पटना और गया में 15 फीसदी से अधिक मुस्लिम मतदाता हैं।












