आधुनिकता के दौर में विलुप्त होती जा रही झिझिया
आलेख: दीपक कुमार तिवारी।
दशहरा का समय आते ही कभी बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में एक विशेष और पारंपरिक खेल, झिझिया, हर घर की पहचान हुआ करता था। यह खेल महिलाओं द्वारा खेला जाने वाला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधि थी, जिसे विशेष रूप से दशहरे के समय में शाम को खेला जाता था। इस खेल में महिलाएं समूह बनाकर अपने घरों के आंगन या दरवाजे पर इकट्ठी होती थीं और गीतों के साथ झिझिया खेला करती थीं।
झिझिया का सांस्कृतिक महत्त्व:
झिझिया एक पारंपरिक खेल है जो देवी दुर्गा की पूजा और शक्ति की आराधना के साथ जुड़ा हुआ है। इसमें महिलाएं मिट्टी के घड़े (जिसे झिझिया कहा जाता है) में दीया जलाकर उसे सिर पर रखकर समूह में नृत्य करती हैं और गीत गाती हैं। यह खेल न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है, बल्कि सामाजिक सहयोग, आपसी सामंजस्य और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है। गीतों के माध्यम से महिलाएं देवी दुर्गा से आशीर्वाद मांगती थीं ताकि उनकी बुरी शक्तियों से रक्षा हो और उनके परिवार में सुख-शांति बनी रहे।
आधुनिकता और झिझिया का विलुप्त होना:
समय के साथ, जैसे-जैसे आधुनिकता और प्रौद्योगिकी का प्रभाव बढ़ा है, वैसे-वैसे पारंपरिक खेल और संस्कृतियों का महत्त्व कम होता जा रहा है। झिझिया, जो कभी बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र की पहचान हुआ करती थी, आज विलुप्त होने की कगार पर है। पहले जहां महिलाएं शाम होते ही अपने दरवाजे या दलान पर झिझिया खेलते हुए देखी जाती थीं, अब यह दृश्य दुर्लभ हो गया है।
शहरीकरण, जीवन की बदलती शैली, और सामाजिक परिवर्तनों के कारण युवा पीढ़ी इस सांस्कृतिक धरोहर से दूर होती जा रही है। अब न तो वैसे समूह बनते हैं, और न ही महिलाओं में उस खेल को लेकर उत्साह दिखाई देता है। कामकाजी जीवन, व्यस्त दिनचर्या और पश्चिमी प्रभावों ने इन परंपराओं को धीरे-धीरे सिमटा दिया है।
झिझिया को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता:
झिझिया जैसी प्राचीन परंपराएं और खेल हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं, जिनका संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। इन परंपराओं के माध्यम से हम अपने पूर्वजों की सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े रह सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ सकते हैं।

इसके लिए स्थानीय समुदायों, सरकार और सांस्कृतिक संगठनों को मिलकर झिझिया जैसे खेलों को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयास करना चाहिए। स्कूलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इन्हें बढ़ावा देकर, हम इस प्राचीन परंपरा को आने वाले समय तक जीवित रख सकते हैं।
निष्कर्ष:
झिझिया एक सांस्कृतिक धरोहर है, जो हमें हमारे अतीत से जोड़ती है और हमारी आस्था और परंपराओं का प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में, जब पारंपरिक खेल और परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं, झिझिया को संरक्षित करना हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।













