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असफलता नहीं, जीवन का सम्मान सिखाइए — युवाओं की सुरक्षा और संवेदनशील व्यवस्था ही सच्चे राष्ट्र निर्माण की नींव

–असफलता नहीं, जीवन का सम्मान सिखाइए — युवाओं की सुरक्षा और संवेदनशील व्यवस्था ही सच्चे राष्ट्र निर्माण की नींव

आलेख: दीपक कुमार तिवारी।

आज का समय उपलब्धियों, प्रतिस्पर्धा और दिखावे का समय बन गया है। हर तरफ सफलता की दौड़ है। कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई इंजीनियर, कोई सरकारी अफसर, तो कोई करोड़पति उद्यमी। माता–पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं, स्कूल–कॉलेज रैंक और पैकेज की बात करते हैं, और समाज हर बच्चे को एक ‘परफेक्ट मशीन’ की तरह देखना चाहता है। लेकिन इस दौड़ में हम एक बेहद जरूरी बात भूलते जा रहे हैं—बच्चा पहले इंसान है, मशीन नहीं।
हाल के वर्षों में लगातार ऐसी खबरें सामने आती हैं, जहां छोटी–सी असफलता या दबाव के कारण युवा जीवन से हार मान लेते हैं। कोई परीक्षा में असफल हुआ, कोई नौकरी नहीं मिली, कोई प्रतियोगिता में पीछे रह गया—और उसने खुद को खत्म कर लिया। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं होती, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की अपूरणीय क्षति होती है। हर ऐसा युवा एक संभावित वैज्ञानिक, शिक्षक, कलाकार, सैनिक या नेता हो सकता था।
अगर हम वैश्विक इतिहास पर नजर डालें, तो पाएंगे कि असली विकास उन्हीं देशों ने किया है जिन्होंने अपने नागरिकों को सबसे पहले सुरक्षित और आत्मविश्वासी बनाया। उदाहरण के तौर पर जापान को देखिए। दो बार परमाणु हमले झेलने के बाद वहां सब कुछ तबाह हो गया था—शहर, अर्थव्यवस्था, परिवार, सपने। लेकिन सरकार और समाज ने हार नहीं मानी। उन्होंने शिक्षा, अनुशासन, मानसिक मजबूती और नागरिकों की जिम्मेदारी को सर्वोपरि रखा। परिणाम यह हुआ कि वही देश आज तकनीक, उद्योग और विकास का प्रतीक बन गया।
इसके विपरीत हमारा अपना देश भारत युवा आबादी के मामले में दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाता है, लेकिन यही युवा वर्ग सबसे ज्यादा दबाव में भी है। प्रतियोगी परीक्षाओं का तनाव, बेरोजगारी, सामाजिक तुलना, सोशल मीडिया की चमक–दमक, और ‘दूसरों से आगे निकलने’ की होड़ ने बच्चों को भीतर से खोखला कर दिया है।
आज सफलता की परिभाषा बहुत संकीर्ण हो गई है। अगर बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बन गया तो सफल, अन्यथा असफल। लेकिन क्या जीवन की कीमत सिर्फ नौकरी और पैसों से तय होनी चाहिए? क्या एक कलाकार, किसान, शिक्षक, खिलाड़ी या समाजसेवी कम महत्वपूर्ण है?
इतिहास गवाह है कि असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी होती है। अगर पहली ठोकर पर इंसान हार मान ले, तो दुनिया कई महान व्यक्तित्वों से वंचित रह जाती।
अगर वायुसेना में चयन न होने की असफलता से कोई युवा टूट जाता, तो देश को ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जैसा वैज्ञानिक और राष्ट्रपति नहीं मिलता, जिन्हें आज भी “मिसाइल मैन” के रूप में सम्मान दिया जाता है। उन्होंने असफलता को अंत नहीं, प्रेरणा बनाया।
अगर जीवन की कठिनाइयों से हार मान ली जाती, तो अरुणिमा सिन्हा जैसी बेटी कृत्रिम पैर के सहारे एवरेस्ट फतह कर दुनिया को साहस का संदेश नहीं देती।
अगर हजारों प्रयोगों में विफल होने के बाद भी कोई प्रयास छोड़ देता, तो थॉमस अल्वा एडिसन अंधेरे को रोशनी में नहीं बदल पाते।
अगर गरीबी और संघर्ष से हार मान ली जाती, तो नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसा कलाकार या दशरथ मांझी जैसा जज्बा हमें प्रेरित नहीं करता।


अगर समाज की बंदिशों से घबराकर लोग चुप हो जाते, तो कुमार विश्वास और खान सर जैसे लोग लाखों युवाओं को नई दिशा नहीं दे पाते।
ये उदाहरण बताते हैं कि असफलता अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत का संकेत है।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी परिवार की है। माता–पिता को समझना होगा कि बच्चे की तुलना किसी और से करना, हर समय डांटना, केवल अंक और नौकरी पर जोर देना, उसे मानसिक रूप से तोड़ सकता है। बच्चे को यह विश्वास देना जरूरी है कि “हार जाओ तो भी हम तुम्हारे साथ हैं।” यही भाव उसे मजबूत बनाता है।
स्कूल और कॉलेजों को भी सिर्फ परीक्षा केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण केंद्र बनना होगा। वहां काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा और संवाद की व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चों को सिखाया जाए कि जीवन में उतार–चढ़ाव सामान्य हैं।
सरकारों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। रोजगार के अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है। जब तक व्यवस्था संवेदनशील नहीं होगी, तब तक युवाओं का भरोसा मजबूत नहीं होगा।
आज जरूरत है कि हम अपने बच्चों को “प्रतियोगिता की मशीन” नहीं, बल्कि “संघर्षशील इंसान” बनाएं। उन्हें यह सिखाएं कि जीवन का मूल्य सबसे बड़ा है। असफलता आने पर रुकना नहीं, रास्ता बदलना है। गिरना नहीं, उठना है।
जीवन को किसी कंप्यूटर प्रोग्राम की तरह “If True Run, Else Stop” की शर्तों में मत बांधिए। जीवन बहता हुआ नदी है, जो रास्ता खुद बनाती है।
राष्ट्र तभी महान बनता है जब उसका हर नागरिक सुरक्षित, सम्मानित और आत्मविश्वासी हो। विश्व गुरु बनने के लिए बड़े भवन या ऊंचे भाषण नहीं, बल्कि खुशहाल नागरिक चाहिए।
समाज की कालिख को और कालिख से नहीं, बल्कि शिक्षा, संवेदना और सकारात्मक सोच से साफ किया जा सकता है।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि अपने बच्चों को डर नहीं, साहस देंगे। दबाव नहीं, समर्थन देंगे। तुलना नहीं, प्रेरणा देंगे।
क्योंकि जिंदा और आत्मविश्वासी युवा ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।
आप इस विषय पर क्या सोचते हैं? अपनी राय जरूर साझा करें।