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स्पेशल: केला की सबसे खतरनाक बीमारी है फ्यूजारियम विल्ट रोग,बिहार के इलाकों में नगण्य हुई फसलें

-केला की सबसे खतरनाक बीमारी है फ्यूजारियम विल्ट रोग,बिहार के इलाकों में नगण्य हुई फसलें

दीपक कुमार तिवारी।पटना/हाजीपुर/मुजफ्फरपुर।

बिहार में केला कुल 34.64 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है, जिससे कुल 1526 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है । बिहार की उत्पादकता 44.06 टन /हेक्टेयर है । राष्ट्रीय स्तर पर केला 880 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है , जिससे कुल 30,008 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है । केला की राष्ट्रीय उत्पादकता 34.10 टन /हेक्टेयर है । फ्यूजारियम विल्ट ( मुरझान )रोग केला की सबसे बड़ी समस्या में से एक है . आज कल जाड़े की वजह से इस रोग को पहचानना मुश्किल हो गया है . विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक ठंढक की वजह से भी पत्तिया पिली हो रही है।
सहायक निदेशक ,पौधा संरक्षण राधेश्याम कुमार ने क्षेत्र भ्रमण के क्रम में बताया कि यदि एक बार खेत रोगग्रस्त हो जाता है तो इसके रोगाणु मृदा में 35-40 वर्षो से अधिक समय तक जीवित रह सकते है और सम्पूर्ण पौधों के मृत्यु का कारण बन सकते हैं। लिहाजा केला उत्पादन के लिए फ्यूजारियम विल्ट रोग एक गंभीर समस्या बन रही है और तमिलनाडु , आन्ध्रप्रदेश, केरल, ओडिसा , पश्चिम बंगाल तथा उत्तर पूर्वी राज्यों में यह रोग बड़े पैमाने पर व्याप्त है ।इसका प्रसार बिहार के हिस्सों में तेजी से बढ़ा है।

रोग के लक्षण:

बाहरी लक्षण रोपण के 4-5 माह बाद ही प्रकट होते हैं तथापि रोगग्रस्त सकर रोपें जाते है तो रोग लक्षण रोपण के 2 माह बाद भी देखे जा सकते है । प्रारम्भिक अवस्था में पुरानी पत्तियों का सीमांत क्षेत्र पीला पड़ जाता है और बाद में यह पीलापन मध्यशिरा (मिडरिब) की ओर बढ़ जाता है और अंततः सम्पूर्ण पत्ती पीली पड़ जाती है । पत्तियों का यह पीलापन ऊपर की पत्तियों की ओर बढ़ जाता है । संक्रमित पत्तियों धीरे-धीरे डंठल या मध्यशिरा के मूल से आभासी तने की ओर झुक जाते हैं। जिससे पौधे का आकार ’स्कर्ट’ जैसा दिखने लगता है । नई पत्तियों में लक्षण अंत में दिखाई पड़ते हैं और ये प्रायःसीधे खड़ी रहती है। जिससे पौधा ’स्पाइकी’ जैसा दिखने लगता है । नई उभरती पत्तियां कांतिहीन एवं पत्तियों की लेमिना कम होती है और अंततः पत्तियों का उभरना बंद हो जाता है । आभासी तने लम्बवत फट जाता है और संक्रमित पौधे की मृत्यु से पूर्व बगल में बड़ी संख्या में सकर निकल जाते है।

यह है रोग के आतंरिक लक्षण :

प्रकंद (कार्म) पर पीला, लाल या भूरी लडियां मौजूद होती है और आभासी तने में काले या भूरे या पीले रंग की लड़ियां होती है और कभी-कभी कवकों के कारण नाड़ियों के ऊतकें रंगविहीन होने से गुच्छे के डंठल पर भी लड़ियां आ जाती है ।
मृदा में मौजूद रोगाणु केले के पौधे को जड़ों के माध्यम से संक्रमित करते हैं, इसके बाद प्रकंद के माध्यम से आभासी तने में मौजूद नाड़ी तंत्र को और अंततः तने में जल और पोषक तत्वों के आवागमन को अवरूद्ध कर देते हैं । इससे पत्तिया पीली पड़ जाती है और पौधे की मृत्यु हो जाती है । जबकि फ्यूजारियम रोगाणु दसको तक क्लेमीडोस्पोर्स के रूप में जीवित रह सकते हैं । एक बार खेत में प्रवेश कर जाने पर क्लेमीडोस्पोर्स के रूप में 40 वर्षो से अधिक समय तक जीवित रह सकते हैं। ये रोगाणु खरपतवारो पर जीवित रह सकते है जैसे, क्लोरिस इनफ्लाटा, क्लोरिस बरबाटा (परपल टाप क्लोरिस), कोम्मोलिना डिफ्यूजा, एनसेटे वेट्रीकोसम, यूफोरबिया हेटेरोफाइला, ट्राइडेक्स प्रोकम्बेंस तथा पैनीकम परप्यूरेसेंस को भी संक्रमित करते और उनमें जीवित रहते हैं।

ऐसे सम्भव है रोग पर नियंत्रण:

सहायक निदेशक ,पौधा संरक्षण राधेश्याम कुमार ने बताया कि इस रोग का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं खोजा जा सका है।इसे केवल प्रबंधित करके कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है,यथा संक्रमित पौधों को दो स्थानों पर ग्लाइफोसेट 2-5 मि. ली./ पौध की दर से सुई लगाना चाहिए (विशेष कर एक सुई पौधे के नीचे की ओर दुसरा जमीं के सतह से 2 फीट ऊपर) खरपतवारनाशी सुई लगायी गई पौधों की मृत्यु के पश्चात उन्हें तुरन्त जला देना चाहिए या अन्य पौधों की पैदावार निकालने तक इन्तजार किया जाना चाहिए। संक्रमित पौधों को उखाड़कर खेत या सिंचाई चैनल में नहीं रखना चाहिए। मुरझान रोग के संकेत मिलने के तुरन्त बाद, कार्बेडाजिम (0.1 से 0.3% ) @ 3-5 ली./पौध की दर से 15 दिनों के अंतराल पर 3-5 बार ड्रेसिंग करना तथा सभी पौधों (संक्रमित एवं असंक्रमित दोनों प्रकार के पौधों) के आभासी तने पर कार्बेडाजिम 0.1% का घोल @ 3 मि.ली. की दर से रोपण के तीसरे, पांचवें तथा सातवें माह में सुई लगाया जाना चाहिए। खेत के प्रवेश स्थान पर नीचे की ओर नल लगे दो ड्रम रखें । पौधे एवं खेत को खरपतवार तथा पौध अवषेशों से मुक्त रखें । संक्रमित खेत से जल को दूसरे खेत में न बहायें ताकि रोग फैलाव से बचा जा सके ।